गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🙏
आज 14 सितंबर 2026 (सोमवार) को गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है।
मुख्य जानकारी:
चतुर्थी तिथि: 14 सितंबर सुबह लगभग 7:06 बजे शुरू होकर 15 सितंबर सुबह 7:44 बजे तक।
गणपति स्थापना और पूजा का शुभ मुहूर्त (दिल्ली/सामान्य): सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक (मध्याह्न काल)।
अन्य शहरों में मुहूर्त थोड़ा अलग हो सकता है (मुंबई में लगभग 11:20–1:48 आदि)।
गणेश विसर्जन (अनंत चतुर्दशी): 25 सितंबर 2026।
भगवान गणेश विघ्नहर्ता, बुद्धि और समृद्धि के देवता हैं। आज घरों और पंडालों में उनकी मूर्ति स्थापित की जाती है, पूजा-अर्चना होती है और मोदक, लड्डू जैसे प्रसाद चढ़ाए जाते हैं।🙏
गणपति (गणेश) की उत्पत्ति की सबसे प्रचलित पौराणिक कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, कुमार खंड) आदि में वर्णित है।
माता पार्वती एक बार स्नान करने जा रही थीं। वे चाहती थीं कि कोई उन्हें परेशान न करे। उनके पास अपने स्वामिभक्त द्वारपाल नहीं थे (शिव के गण मुख्यतः शिव की आज्ञा मानते थे)। इसलिए उन्होंने अपने शरीर पर लगाए गए हल्दी के उबटन (या शरीर के मैल/मिट्टी) से एक सुंदर बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। बालक जीवित हो उठा। पार्वती ने उसे अपना पुत्र माना और आदेश दिया कि वह द्वार पर पहरा दे तथा किसी को भी अंदर न आने दे।
कुछ देर बाद भगवान शिव आए और अंदर जाना चाहा। बालक गणेश ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें रोक दिया। शिव के गणों और गणेश के बीच युद्ध हुआ। कोई भी गणेश को हरा न सका। अंत में क्रोधित शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया।
पार्वती को जब पता चला तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हुईं। शिव ने उन्हें शांत करने और बालक को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया। उन्होंने गणों को आदेश दिया कि जो भी जीव सबसे पहले मिले, उसका सिर लाएँ। सबसे पहले एक हाथी का बच्चा मिला। उसका सिर बालक के शरीर पर लगाकर शिव ने उसे पुनः जीवित कर दिया। इस प्रकार गणेश जी गजानन (हाथी मुख वाले) बने। शिव ने उन्हें अपने सभी गणों का स्वामी (गणपति) बनाया और वरदान दिया कि हर शुभ कार्य की शुरुआत में सबसे पहले उनकी पूजा होगी।
अन्य संस्करण
कुछ कथाओं में पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुण्यक व्रत किया था, जिसका फल गणेश के रूप में मिला।
कहीं शनि देव की दृष्टि से सिर जल जाने और हाथी का सिर लगाने का उल्लेख है।
अन्य पुराणों (जैसे ब्रह्मवैवर्त पुराण) में जन्म की थोड़ी भिन्न कथाएँ हैं, जिसमें वे अयोनिज (गर्भ से न जन्मे) माने गए हैं।
वैदिक साहित्य में ‘गणपति’ शब्द गणों के स्वामी के रूप में रुद्र/ब्रह्मणस्पति आदि से जुड़ा दिखाई देता है, लेकिन हाथी मुख वाले गणेश का पूर्ण रूप बाद के पौराणिक काल में विकसित हुआ।
यह कथा दर्शाती है कि गणेश माता पार्वती की शक्ति से उत्पन्न हुए, शिव की कृपा से पुनर्जीवित हुए और विघ्नहर्ता तथा प्रथम पूज्य देवता बने।
गणपति बाप्पा मोरया!
मंगलमूर्ति मोरया!
विघ्नहर्ता मोरया!
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संपादक श्री दयाशंकर गुुुप्ता जी
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