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उड़ीसा के एक गाँव में बंधु मोहंती नाम के व्यक्ति रहते थे। वे बहुत ही गरीब थे और केवल भिक्षा माँग कर अपना व परिवार का पोषण करते थे।

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हिमालय की गोद में बसा एक छोटा सा गाँव था, जहाँ एक गरीब भक्त रहता था। उसका नाम था गोपाल। उसके पास न धन था, न साधन, लेकिन उसके हृदय में भगवान शिव के लिए अटूट प्रेम था।

 हिमालय की गोद में बसा एक छोटा सा गाँव था, जहाँ एक गरीब भक्त रहता था। उसका नाम था गोपाल। उसके पास न धन था, न साधन, लेकिन उसके हृदय में भगवान शिव के लिए अटूट प्रेम था। हर दिन वह शिवलिंग पर जल चढ़ाता और एक ही प्रार्थना करता—“हे भोलेनाथ, मुझे अपने चरणों तक पहुँचा दो।” एक दिन उसने निश्चय किया कि वह कैलाश पर्वत पर जाकर स्वयं महादेव के दर्शन करेगा। गाँव वालों ने उसे रोका—“यह मार्ग कठिन है, तुम वहाँ नहीं पहुँच पाओगे।” लेकिन गोपाल की भक्ति अडिग थी। वह नंगे पैर, बिना भोजन-पानी के, केवल “ॐ नमः शिवाय” का जाप करते हुए चल पड़ा। रास्ता बेहद कठिन था—बर्फीली हवाएँ, ऊँचे पहाड़, और खतरनाक रास्ते। कई बार वह गिरा, उसके पैर लहूलुहान हो गए, शरीर थक कर चूर हो गया। एक रात तो वह इतनी ठंड में गिर पड़ा कि लगा अब प्राण निकल जाएंगे। उसी क्षण उसने कमजोर आवाज़ में पुकारा—“हे शिव, अब मैं नहीं चल सकता… अगर सच्ची भक्ति है तो मुझे अपने पास बुला लो…” तभी एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। उसके सामने स्वयं भगवान शिव खड़े थे। उनके चेहरे पर करुणा और प्रेम था। उन्होंने गोपाल को उठाया और मुस्कुराकर कहा— “भक्त, तुम कैलाश नहीं आए… ...

एक बार की बात है। वृन्दावन में एक संत रहा करते थे। उनका नाम था कल्याण, वे बाँके बिहारी जी के परमभक्त थे। एक बार उनके पास एक सेठ आया, अब था तो सेठ... लेकिन कुछ समय से उसका व्यापार ठीक से नहीं चल रहा था।

 एक बार की बात है। वृन्दावन में एक संत रहा करते थे। उनका नाम था कल्याण, वे बाँके बिहारी जी के परमभक्त थे। एक बार उनके पास एक सेठ आया, अब था तो सेठ... लेकिन कुछ समय से उसका व्यापार ठीक से नहीं चल रहा था। उसको व्यापार में बहुत नुकसान हो रहा था। सेठ उन संत के पास गया और उनको अपनी सारी व्यथा बताई और और कहा, महाराज महाराज मेरे व्यापार में कुछ दिनों से काफी नुकसान हो रहा है आप कोई उपाय करियाँ संत ने कहा सेठ जी अगर मैं ऐसा कोई उपाय जानता तो आपको अवश्य बता देता। लेकिन मैं ऐसी कोई विद्या नहीं जानता जिससे मैं आपके व्यापार को ठीक कर सकु, ये मेरे बस में नहीं है। हमारा तो एक ही सहारा है, बिहारी जी.... इतनी बात हो ही पाई थी, कि बिहारी जी के मंदिर खुलने का समय हो गया। संत सेठ जी को बिहारी जी के मंदिर में ले आये और अपने हाँथ को बिहारी जी की ओर करते हुए सेठ जी को बोले, आपको जो कुछ भी मांगना है... जो कुछ भी कहना है... इनसे कह दो। अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह  ये सबकी कामनाओं को पूर्ण कर देते है। सेठ जी ने बिहारी जी से प्रार्थना की, दो चार दिन वृन्...

रावण पर विजय प्राप्त करने और भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद, विभीषण अयोध्या में रुक गए थे। जब उनके वापस लंका जाने का समय आया, तो श्री राम ने उन्हें अपने कुल देवता 'श्री रंगनाथ' की दिव्य विग्रह (मूर्ति) उपहार स्वरूप दी। यह वही मूर्ति थी जिसकी पूजा इक्ष्वाकु वंश के राजा सदियों से करते आ रहे थे।

 रावण पर विजय प्राप्त करने और भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद, विभीषण अयोध्या में रुक गए थे। जब उनके वापस लंका जाने का समय आया, तो श्री राम ने उन्हें अपने कुल देवता 'श्री रंगनाथ' की दिव्य विग्रह (मूर्ति) उपहार स्वरूप दी। यह वही मूर्ति थी जिसकी पूजा इक्ष्वाकु वंश के राजा सदियों से करते आ रहे थे। विग्रह सौंपते समय भगवान राम ने विभीषण को एक महत्वपूर्ण चेतावनी दी:  "विभीषण, इस विग्रह को तुम जहाँ भी एक बार धरती पर रख दोगे, यह वहीं स्थापित हो जाएगी। फिर इसे हिलाया नहीं जा सकेगा।" विभीषण उस मूर्ति को लेकर दक्षिण की ओर चल दिए। लेकिन देवताओं को चिंता हुई कि इतनी पवित्र और प्रभावशाली मूर्ति यदि लंका चली गई, तो भारत की आध्यात्मिक शक्ति कम हो जाएगी। देवताओं ने इसके समाधान के लिए प्रथम पूज्य भगवान गणेश (विनायक) से प्रार्थना की। विभीषण जब कावेरी नदी के तट पर पहुँचे, तो वे संध्यावंदन और स्नान करना चाहते थे। विग्रह को हाथ में लेकर स्नान करना संभव नहीं था, और वे उसे नीचे रख नहीं सकते थे। तभी वहाँ गणेश जी एक छोटे बालक का रूप धरकर आए। विभीषण ने उस बालक पर विश्वास करके विग्रह उसे थमा दिय...

श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णित 'गजेंद्र मोक्ष' की कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव के अहंकार, संसार के मोह और अंततः ईश्वर की शरणागति का एक अद्भुत दर्शन है।

 श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णित 'गजेंद्र मोक्ष' की कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव के अहंकार, संसार के मोह और अंततः ईश्वर की शरणागति का एक अद्भुत दर्शन है। आइए इस पावन कथा को विस्तार से समझते हैं: त्रिकूट पर्वत और गजेंद्र का वैभव क्षीरसागर के बीच में एक अत्यंत सुंदर त्रिकूट पर्वत था। उसकी तलहटी में एक बहुत बड़ा और शक्तिशाली हाथियों का राजा रहता था, जिसका नाम था गजेंद्र। वह इतना बलवान था कि उसकी गंध मात्र से शेर और व्याघ्र जैसे हिंसक जीव भी दूर भाग जाते थे। एक दिन गजेंद्र अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ विहार करते हुए प्यास बुझाने के लिए एक विशाल सरोवर के पास पहुँचा। वह अपनी शक्ति के मद (अहंकार) में चूर था और सरोवर के जल में खूब क्रीड़ा करने लगा। काल रूपी 'ग्राह' का आक्रमण जब गजेंद्र अपनी पत्नियों को अपनी सूंड से जल छिड़क कर नहला रहा था, तभी अचानक एक बहुत बड़े और शक्तिशाली मगरमच्छ (ग्राह) ने पानी के भीतर से उसका पैर पकड़ लिया।  * संघर्ष: गजेंद्र और ग्राह के बीच भयानक युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध एक-दो दिन नहीं, बल्कि एक हजार वर्षों तक चला।  *...

राष्ट्रीय लोक सेवा दिवस (या राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस) हर वर्ष 21 अप्रैल को भारत में मनाया जाता है। यह दिन देश की सिविल सेवाओं (IAS, IPS, IFS आदि) में कार्यरत लोक सेवकों के समर्पण, कड़ी मेहनत और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को सम्मानित करने के लिए समर्पित है।

 राष्ट्रीय लोक सेवा दिवस (या राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस) हर वर्ष 21 अप्रैल को भारत में मनाया जाता है। यह दिन देश की सिविल सेवाओं (IAS, IPS, IFS आदि) में कार्यरत लोक सेवकों के समर्पण, कड़ी मेहनत और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को सम्मानित करने के लिए समर्पित है।  इतिहास 21 अप्रैल 1947 को स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने दिल्ली के मेटकाफ हाउस में प्रशासनिक सेवाओं के पहले बैच के परिवीक्षार्थी अधिकारियों को संबोधित किया था। उन्होंने सिविल सेवकों को "भारत का स्टील फ्रेम" (Steel Frame of India) कहा था, जो आज भी उनकी मजबूत और निष्ठावान भूमिका का प्रतीक है। इसी ऐतिहासिक घटना की याद में 2006 से हर साल 21 अप्रैल को राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस मनाया जाने लगा। पहला समारोह विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित हुआ था।  महत्व यह दिवस सिविल सेवकों को नागरिकों की सेवा में अपनी प्रतिबद्धता को नवीनीकृत करने का अवसर प्रदान करता है। यह भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले अधिकारियों के योगदान को रेखांकित करता है, जो नीति निर्माण, विकास योजनाओं के क्रियान्वयन औ...

तेली समाज के गौरव, राष्ट्र के गौरव, दानवीर भामाशाह जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन! 🙏

 भामाशाह (1547–1600) भारतीय इतिहास के एक महान दानवीर, सेनापति, मंत्री और महाराणा प्रताप के विश्वासपात्र सहयोगी थे। वे मेवाड़ राज्य (राजस्थान) के उद्धार और स्वाभिमान की रक्षा में अपनी पूरी संपत्ति समर्पित करने के लिए प्रसिद्ध हैं।  जन्म और पृष्ठभूमि जन्म: 28 जून 1547 (कुछ स्रोतों में 29 अप्रैल 1547) को मेवाड़ राज्य में, वर्तमान पाली जिले के सादड़ी गांव या चित्तौड़गढ़ क्षेत्र में। परिवार: पिता — भारमल कावड़िया (रणथम्भौर दुर्ग के किलेदार, राणा सांगा द्वारा नियुक्त; बाद में राणा उदय सिंह के प्रधानमंत्री)। माता — कर्पूरदेवी। वे ओसवाल जैन समुदाय (कावड़िया/कांवड़िया गोत्र) से थे और जैन धर्म के अनुयायी थे। उनके पिता की वजह से बाल्यकाल से ही मेवाड़ के शासकों से निकट संबंध था। महाराणा प्रताप के साथ योगदान भामाशाह महाराणा प्रताप के बचपन के मित्र, सलाहकार और सेनापति थे। हल्दीघाटी के युद्ध (1576) के बाद मेवाड़ की स्थिति बहुत खराब हो गई थी — सेना बिखरी हुई थी, संसाधन खत्म हो चुके थे और महाराणा प्रताप परिवार सहित जंगलों-पहाड़ियों में भटक रहे थे। इस कठिन समय में भामाशाह ने अपनी सारी व्यक्तिगत...