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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गिरफ्तारी के लिखित कारण बताना अनिवार्य, उल्लंघन पर पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई

 सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गिरफ्तारी के लिखित कारण बताना अनिवार्य, उल्लंघन पर पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई



नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय पुलिस को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में और आरोपी की समझ आने वाली भाषा में बताना अनिवार्य है। संविधान के अनुच्छेद २२(१) का यह प्रावधान महज औपचारिकता नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है। इसका उल्लंघन होने पर गिरफ्तारी अवैध हो जाती है और संबंधित पुलिस अधिकारी पर विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने पंजाब के शिरोमणी अकाली दल से जुड़े नेता जसकरणजीत सिंह देओल के मामले में यह फैसला सुनाया। उन्हें मई २०२६ में पीओसीएसओ और बीएनएस के तहत नाबालिग से संबंधित आरोपों में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन लिखित कारण नहीं दिए गए थे। स्थानीय मजिस्ट्रेट ने गिरफ्तारी अवैध ठहराकर रिहाई का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने स्थगन दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए गिरफ्तारी को असंवैधानिक करार दिया।

कोर्ट के मुख्य बिंदु:

लिखित कारण अनिवार्य: मौखिक जानकारी पर्याप्त नहीं। कारण आरोपी की समझ आने वाली भाषा में लिखित रूप में दिए जाने चाहिए और उसकी प्रति तुरंत सौंपी जानी चाहिए।

गिरफ्तारी अपने-आप अवैध: लिखित कारण न देने पर गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड दोनों अवैध हो जाती हैं। यह नियम पीएमएलए, यूएपीए जैसी विशेष कानूनों सहित सभी मामलों में लागू होता है।

दोबारा गिरफ्तारी की सख्त प्रक्रिया: एक बार अनुच्छेद २२(१) के उल्लंघन के कारण रिहाई होने पर पुलिस सीधे दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती। इसके लिए पहले लिखित कारण देने होंगे, वरिष्ठ अधिकारी का समर्थन (एंडोर्समेंट) लेना होगा, पहली बार कारण न देने का स्पष्टीकरण देना होगा और संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होगी।

जांच दूसरे अधिकारी को सौंपनी होगी: जिस अधिकारी ने अवैध गिरफ्तारी की, उसी के पास आगे की जांच नहीं रह सकती। जांच दूसरे अधिकारी को सौंपी जानी चाहिए।

विभागीय जांच अनिवार्य: दोषी अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच कर सर्विस बुक में प्रविष्टि करनी होगी।

सभी डीजीपी को निर्देश: कोर्ट ने फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के डीजीपी को भेजने का आदेश दिया है, ताकि सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित हो।

कोर्ट ने कहा, “एक बार अनुच्छेद २२(१) का उल्लंघन हो जाए तो दोबारा गिरफ्तारी का अधिकार उसी अधिकारी के हाथ में नहीं छोड़ा जा सकता, जिसने संविधान का उल्लंघन किया है। उस पर न्यायिक निगरानी जरूरी है।”

नागरिकों के लिए संदेश साफ है—पुलिस आने पर घबराएं नहीं। पूछें, “मेरी गिरफ्तारी के लिखित कारण दीजिए।” यह आपका मौलिक अधिकार है। कारण न मिलने पर गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी।

यह फैसला पुलिस की मनमानी पर लगाम लगाने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने की दिशा में एक मजबूत कदम है? 

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👉 संपादक एवं लेखक: समाज सेवक, RTI कार्यकर्ता👈

👉 श्री दयाशंकर गुप्ता जी👈 👉 नमस्कार चमत्कार 👈

👉 मेरा देश मेरा वतन समाचार 👈 👉 बुलंद आवाज न्यूज़ 👈

👉 दया की सोच👈    नोट........ 👉👇🙏

 दोस्तों अप सभी पाठकों से उम्मीद करता हूं कि आप सभी ने यह आर्टिकल को अंत तक पढ़े होंगे एवं यह आर्टिकल आपको बेहद पसंद आया होगा हैं। 

संविधान का चौथा स्तंभ ने अपने दिल की कुछ प्रमुखताएं या बातें या भावनाएं रखा है अप सभी के बिच में सभी नागरिकों के समक्ष प्रस्तुत किया है और लिखने में कोई त्रुटि हुई हैं। 

तो क्षमा करें इस के लिए हम आप से क्षमा मांगते हैं। और हमारे इस आर्टिकल को लाइक करें शेयर करें? 🪶🙏 

🙏 संपादक व लेखक व अध्यक्ष व RTI आरटीआई कार्यकर्ता 

श्री दयाशंकर गुप्ता जी की तरफ से बहुत-बहुत धन्यवाद🙏

🙏जय संविधान जय भीम जय, संविधान के चौथा स्तंभ की जय 🙏

जय हिंद 🇮🇳 जय भारत 🇮🇳 जय महाराष्ट्र 🙏 वंदे मातरम🙏


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