रिश्वत मांगना शुद्ध आपराधिक कृत्य है, धारा 17ए पीसी एक्ट का संरक्षण नहीं मिलेगा: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि लोक सेवक द्वारा रिश्वत की मांग करना शुद्ध आपराधिक कृत्य है, जो उसके आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों से जुड़ा नहीं होता। इसलिए ऐसे मामलों में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 17ए का संरक्षण उपलब्ध नहीं होता।
केस का ब्योरा
यह फैसला तेजराम बनाम राजस्थान राज्य (2026 INSC 1147) मामले में 16 अक्टूबर 2026 को आया। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने राजस्थान के एक पुलिस कांस्टेबल की अपील खारिज कर दी।
अपीलकर्ता तेजराम सिराही में डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस कार्यालय में कांस्टेबल पद पर तैनात थे। उनके खिलाफ आरोप था कि उन्होंने शिकायतकर्ता से सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस के नाम पर 1.5 लाख रुपये की रिश्वत मांगी। एफआईआर 2021 में दर्ज हुई और विशेष न्यायालय (एंटी-करप्शन ब्यूरो, पाली) ने 12 सितंबर 2024 को धारा 7 पीसी एक्ट के तहत आरोप तय किए। राजस्थान उच्च न्यायालय (जोधपुर) ने 26 मार्च 2025 को उनकी आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई थी।
अपीलकर्ता का तर्क
अपीलकर्ता का कहना था कि धारा 17ए के तहत जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी जरूरी थी, जो नहीं ली गई। इसलिए पूरी कार्यवाही अवैध है।
सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष
अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 17ए तभी लागू होती है जब आरोपित अपराध लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों के निर्वहन में लिए गए किसी निर्णय या सिफारिश से संबंधित हो। रिश्वत मांगना ऐसा कोई निर्णय या सिफारिश नहीं है। यह शुद्ध आपराधिक कृत्य है, जो आधिकारिक कार्यों से बिल्कुल असंबद्ध है।
अदालत ने कहा,
“रिश्वत मांगने का कृत्य शुद्ध आपराधिक कृत्य है, जो आधिकारिक कार्यों से जुड़ा नहीं है और लोक सेवक के रूप में अपीलकर्ता के किसी निर्णय या सिफारिश से संबंधित नहीं है। इसलिए यह धारा 17ए के सुरक्षात्मक छत्र के अंतर्गत नहीं आता।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 17ए की वैधता पर लंबित बड़े बेंच का संदर्भ इस मामले पर लागू नहीं होता, क्योंकि यहां धारा ही आकर्षित नहीं होती। धारा 19 के तहत अभियोजन की मंजूरी भी संज्ञान लेने से पहले मिल चुकी थी।
नतीजा
सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी। आरोप तय करने का आदेश और मुकदमा जारी रहेगा।
यह फैसला भ्रष्टाचार के मामलों में धारा 17ए के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि रिश्वत मांगने जैसे सीधे आपराधिक कृत्यों को आधिकारिक कर्तव्य का छद्म आवरण नहीं दिया जा सकता।?
🙏👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇🙏
“सूत्रों के अनुसार…”🪶🙏
👉 संपादक एवं लेखक: समाज सेवक, RTI कार्यकर्ता👈
👉 श्री दयाशंकर गुप्ता जी👈 👉 नमस्कार चमत्कार 👈
👉 मेरा देश मेरा वतन समाचार 👈 👉 बुलंद आवाज न्यूज़ 👈
👉 दया की सोच👈 🙏जनहित के लिए🙏 नोट........ 👉👇🙏
दोस्तों अप सभी पाठकों से उम्मीद करता हूं कि आप सभी ने यह आर्टिकल को अंत तक पढ़े होंगे एवं यह आर्टिकल आपको बेहद पसंद आया होगा हैं।
संविधान का चौथा स्तंभ ने अपने दिल की कुछ प्रमुखताएं या बातें या भावनाएं रखा है अप सभी के बिच में सभी नागरिकों के समक्ष प्रस्तुत किया है और लिखने में कोई त्रुटि हुई हैं।
तो क्षमा करें इस के लिए हम आप से क्षमा मांगते हैं। और हमारे इस आर्टिकल को लाइक करें शेयर करें? 🪶🙏
🙏 संपादक व लेखक व अध्यक्ष व RTI आरटीआई कार्यकर्ता
श्री दयाशंकर गुप्ता जी की तरफ से बहुत-बहुत धन्यवाद🙏
🙏जय संविधान जय भीम जय, संविधान के चौथा स्तंभ की जय 🙏
जय हिंद 🇮🇳 जय भारत 🇮🇳 जय महाराष्ट्र 🙏 वंदे मातरम🙏



Comments