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श्रीमती रमाबाई भीमराव आंबेडकर (जिन्हें प्रेम से रमाई, माता रमाई या रामू भी कहा जाता है) डॉ. भीमराव आंबेडकर (बाबासाहेब आंबेडकर) की पहली पत्नी थीं। वे बाबासाहेब के जीवन में एक मजबूत सहारा और त्याग की मिसाल बनीं। उनके बिना बाबासाहेब का संघर्ष और उच्च शिक्षा की यात्रा इतनी आसान नहीं होती।

 श्रीमती रमाबाई भीमराव आंबेडकर (जिन्हें प्रेम से रमाई, माता रमाई या रामू भी कहा जाता है) डॉ. भीमराव आंबेडकर (बाबासाहेब आंबेडकर) की पहली पत्नी थीं। वे बाबासाहेब के जीवन में एक मजबूत सहारा और त्याग की मिसाल बनीं। उनके बिना बाबासाहेब का संघर्ष और उच्च शिक्षा की यात्रा इतनी आसान नहीं होती।




जन्म और प्रारंभिक जीवन

जन्म: ७ फरवरी १८९८ (कुछ स्रोतों में १८९६-१८९७ भी बताया जाता है)।

जन्मस्थान: महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के दापोली के निकट वानंद (वणंद) गाँव में।

परिवार: एक बहुत गरीब दलित (महार) परिवार में जन्मीं। पिता का नाम भिकु धोत्रे (वलंगकर) था, जो मछली बेचने का काम करते थे (दाभोल बंदरगाह से टोकरियाँ भरकर बाजार तक ले जाते थे)। माता का नाम रुक्मिणी था।

बचपन में ही माता-पिता दोनों का निधन हो गया। इसके बाद उनके मामा और चाचा ने उन्हें और उनके भाई-बहनों (तीन बहनें और एक भाई शंकर) का पालन-पोषण किया। वे मुंबई में रहने लगे।

विवाह

विवाह: अप्रैल १९०६ में बंबई (मुंबई) के बायकुला सब्जी बाजार के पास एक साधारण समारोह में हुआ।

उस समय बाबासाहेब की उम्र लगभग १४-१५ वर्ष थी और रमाबाई की उम्र ९-१० वर्ष (कुछ स्रोतों में १२-१५ वर्ष भी) बताई जाती है। उस समय बाल-विवाह प्रथा आम थी।

बाबासाहेब उन्हें प्यार से रामू कहते थे, जबकि वे उन्हें साहेब कहती थीं।

जीवन में संघर्ष और योगदान

रमाबाई ने अत्यंत गरीबी, भूख, सामाजिक भेदभाव और व्यक्तिगत दुखों के बावजूद बाबासाहेब का साथ कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने:

घर संभाला, बच्चों की परवरिश की।

गहने और घरेलू सामान तक बेचकर बाबासाहेब की उच्च शिक्षा (अमेरिका और लंदन की पढ़ाई) के लिए आर्थिक मदद की।

चार बच्चों की असमय मृत्यु का दुख सहा (केवल एक पुत्र यशवंत आंबेडकर जीवित रहे, जिनका जन्म १९१२ में हुआ और वे १९७७ तक जीवित रहे)।

बाबासाहेब के सामाजिक आंदोलन में मूक सहयोग दिया। वे महिलाओं की बैठकों में भी शामिल होती थीं और दलित महिलाओं के उत्थान में योगदान दिया।

बाबासाहेब ने खुद कहा था कि रमाबाई का समर्थन उनकी उच्च शिक्षा और क्षमता को साकार करने में महत्वपूर्ण था। उन्होंने अपनी किताब "पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया" को रमाबाई को समर्पित किया था।

मृत्यु

मृत्यु: २७ मई १९३५ को मुंबई के राजगृह में लंबी बीमारी के बाद हुई (उम्र लगभग ३७ वर्ष)।

उनकी मृत्यु ने बाबासाहेब को गहरा आघात पहुँचाया।

स्मृति और सम्मान

बाबासाहेब के अनुयायी उन्हें माता रमाई के रूप में पूजते हैं और "जय भीम, जय रमाई" का नारा लगाते हैं।

उनके नाम पर कई स्मारक, पार्क, स्कूल और संस्थाएँ हैं।

उनकी जीवन पर कई फिल्में बनीं, जैसे मराठी फिल्म "रमाबाई भीमराव आंबेडकर" (२०१९ में वीणा जामकर ने मुख्य भूमिका निभाई) और हिंदी डब्ड फिल्में।

वे त्याग, धैर्य और समर्पण की प्रतीक मानी जाती हैं।

रमाबाई का जीवन बताता है कि महान व्यक्तियों के पीछे अक्सर ऐसी महिलाएँ होती हैं जो चुपचाप बलिदान देती हैं। उनकी जयंती (७ फरवरी) और पुण्यतिथि (२७ मई) पर लोग उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।

जय भीम! जय रमाई! 🙏


श्रीमती रमाबाई भीमराव आंबेडकर—एक ऐसी नारी जिन्होंने अपना पूरा जीवन त्याग, सहनशीलता और अटूट समर्थन में समर्पित कर दिया। बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को देश-समाज सेवा के लिए जो ऊर्जा और प्रेरणा मिली, उसके पीछे रमाबाई जी का अदम्य संघर्ष और ममता ही थी। गरीबी, भेदभाव और कष्टों के बीच भी उन्होंने कभी हार न मानी—बाबासाहेब की पढ़ाई, उनके आंदोलनों और अंततः संविधान निर्माण के सफर में उनका साथ अटूट रहा।


जय भीम! जय भारत! 🙏

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        संपादक श्री दयाशंकर गुुुप्ता जी








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जय संविधान जय भीम जय संविधान का चौथा स्तंभ ने अपने दिल की कुछ प्रमुखताएं या बातें या भावनाएं रखा है अप सभी के बिच में सभी नागरिकों के समक्ष प्रस्तुत किया है और लिखने में कोई त्रुटि हुई है तो क्षमा करें लिखने गलती हुई हैं तो क्षमा करना श्री दयाशंकर गुप्ता जी की तरफ से बहुत-बहुत धन्यवाद🙏



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