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प्रिय बहनों-भाइयों और भांजे-भांजियों,

 प्रिय बहनों-भाइयों और भांजे-भांजियों, आइए, 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर हम सब एक स्थान पर जुटें और धरती माँ की सेवा का संकल्प लें। आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित धरती देना ही सबसे बड़ी सेवा है। यह धरती केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, यह हमारी माँ है। यही हमें जीवन देती है और इस पर लगे पेड़-पौधे हमें ऑक्सीजन देकर साँसें देते हैं। अगर हमें स्वस्थ रहना है, तो धरती माँ का स्वस्थ रहना भी जरूरी है। इसलिए पर्यावरण बचाने का सबसे बड़ा माध्यम है—पेड़ लगाना। मैं रोज पेड़ लगाता हूँ, लेकिन अकेले मेरे पेड़ लगाने से काम नहीं चलेगा। मैं आप सभी से आह्वान करता हूँ कि आप अपने जन्मदिन, बच्चों के जन्मदिन, शादी की वर्षगांठ और माता-पिता की पुण्य स्मृति में एक पेड़ अवश्य लगाएँ। अगर आपके मन में पेड़ लगाने और पर्यावरण संरक्षण का भाव है, तो... 📞 मिस्ड कॉल करें: 8929629475 मिस्ड कॉल करते ही आप इस अभियान से जुड़ जाएंगे। आइए, 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर हम सब एक स्थान पर जुटें और धरती माँ की सेवा का संकल्प लें। आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित धरती देना ही सबसे बड़ी सेवा है।

चिमुकल्या हातांची मोठी झेप: साडेसहा वर्षांच्या ईशाने दिला पर्यावरणासोबत माणुसकीचा संदेश

चिमुकल्या हातांची मोठी झेप: साडेसहा वर्षांच्या ईशाने दिला पर्यावरणासोबत माणुसकीचा संदेश ठाणे: पर्यावरणाचे रक्षण करण्यासाठी केवळ वय नाही, तर संवेदनशील मन आणि संस्कारांची गरज असते, हे ठाण्यातील ईशा संदीप मोरे या ६.५ वर्षांच्या चिमुकलीने सिद्ध करून दाखवले आहे. ईशाने तिचे आई-वडील कविता आणि संदीप मोरे यांच्यासोबत भेट देऊन 'प्रकल्प आशादायी' (Project Aashayein) उपक्रमासाठी स्वतः जमा केलेल्या ५१ NWPP (नॉन-वोव्हन) पिशव्या सुपूर्द केल्या. कुटुंबाचा सहभाग: खऱ्या जागरूकतेची सुरुवात ईशाचे हे पाऊल केवळ पिशव्या जमा करण्यापुरते मर्यादित नाही, तर ते 'REACH' (जबाबदारी, सहानुभूती, जागरूकता, करुणा आणि सुसंवाद) या मूल्यांचे जिवंत उदाहरण आहे. जेव्हा कविता आणि संदीप मोरे यांच्यासारखे पालक आपल्या मुलांना अशा उपक्रमात सहभागी करून घेतात, तेव्हा खऱ्या अर्थाने समाज बदलतो. पर्यावरण रक्षण हा केवळ सरकारचा विषय नसून, घरातील प्रत्येक सदस्याने त्यात वाटा उचलणे हाच खऱ्या जागरूकतेचा आणि समस्येवरचा खरा उपाय आहे. काय आहे 'प्रकल्प आशादायी'? हा ठाणे जिल्हा प्रशासनाचा एक पथदर्शी (Pilot) प्रकल्प असून तो...

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (World Press Freedom Day) हर साल 3 मई को मनाया जाता है।

 विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (World Press Freedom Day) हर साल 3 मई को मनाया जाता है।  इतिहास संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1993 में 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया। यह दिन 1991 में यूनेस्को (UNESCO) द्वारा शुरू किए गए प्रयासों का परिणाम है। मुख्य उद्देश्य: प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करना, मीडिया पर हमलों की निंदा करना, मारे गए पत्रकारों को श्रद्धांजलि देना और दुनिया भर में प्रेस की स्थिति का मूल्यांकन करना।  2026 का थीम “Shaping a Future at Peace: Promoting Press Freedom for Human Rights, Development, and Security” (शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण: मानवाधिकार, विकास और सुरक्षा के लिए प्रेस स्वतंत्रता को बढ़ावा देना)f4d3ed यह थीम पत्रकारिता, प्रौद्योगिकी (जैसे AI), और मानवाधिकारों के बीच संबंध पर जोर देती है। 2026 की मुख्य घटनाएँ विश्व सम्मेलन: 4-5 मई 2026 को लुसाका, जाम्बिया में आयोजित होगा। थीम: “Shaping a Future of Peace”। यूनेस्को और जाम्बिया सरकार द्वारा सह-आयोजित।  महत्व यह दिन याद दिलाता है कि: स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रेस लोकतंत्र की आधारशि...

१ मे महाराष्ट्र दिवस (Maharashtra Day / Maharashtra Din) महाराष्ट्र राज्याच्या स्थापना दिवस म्हणून साजरा केला जातो. हा दिवस १ मे १९६० रोजी महाराष्ट्र राज्याच्या औपचारिक निर्मितीची आठवण करून देतो

 १ मे महाराष्ट्र दिवस (Maharashtra Day / Maharashtra Din) महाराष्ट्र राज्याच्या स्थापना दिवस म्हणून साजरा केला जातो. हा दिवस १ मे १९६० रोजी महाराष्ट्र राज्याच्या औपचारिक निर्मितीची आठवण करून देतो.  का १ मे रोजी? स्वातंत्र्यानंतर भारतात राज्यांचे पुनर्गठन भाषिक आधारावर करण्यात आले. तत्कालीन बॉम्बे राज्य (Bombay State) द्विभाषिक होते (मराठी आणि गुजराती भाषिक भाग). मराठी भाषिक लोकांसाठी स्वतंत्र राज्याची मागणी सयुक्त महाराष्ट्र चळवळ (Samyukta Maharashtra Movement) द्वारे जोरदार झाली. या चळवळीत अनेक नेते आणि कार्यकर्ते सहभागी होते. बॉम्बे पुनर्गठन अधिनियम १९६० (Bombay Reorganisation Act, 1960) अंतर्गत १ मे १९६० रोजी बॉम्बे राज्याचे विभाजन झाले: महाराष्ट्र (मराठी भाषिक, मुंबई राजधानीसह) गुजरात (गुजराती भाषिक) याच दिवशी महाराष्ट्र राज्य अस्तित्वात आला. त्यामुळे हा दिवस महाराष्ट्र दिवस म्हणून राज्य सुट्टीचा दिवस आहे. साजरा कसा केला जातो? मुंबईतील शिवाजी पार्कसारख्या ठिकाणी मुख्य कार्यक्रम, ध्वजारोहण, परेड आणि सांस्कृतिक कार्यक्रम. राज्यभरात सांस्कृतिक कार्यक्रम, मराठी अस्मिता आणि अभि...

1 मई को गुजरात दिवस (Gujarat Day या Gujarat Sthapana Divas / गुजरात गौरव दिन) मनाया जाता है।

 1 मई को गुजरात दिवस (Gujarat Day या Gujarat Sthapana Divas / गुजरात गौरव दिन) मनाया जाता है।  यह दिन 1 मई 1960 को गुजरात राज्य की स्थापना की याद में मनाया जाता है। उस दिन बॉम्बे रीऑर्गनाइजेशन एक्ट के तहत द्विभाषी बॉम्बे राज्य को दो भागों में बाँटा गया: मराठी भाषी क्षेत्र → महाराष्ट्र गुजराती भाषी क्षेत्र → गुजरात इस तरह गुजरात एक अलग राज्य बना, और उसी दिन महाराष्ट्र दिवस भी मनाया जाता है।8cac9c इतिहास का संक्षिप्त विवरण स्वतंत्रता के बाद गुजरात और महाराष्ट्र दोनों बॉम्बे राज्य का हिस्सा थे। भाषाई आधार पर अलग राज्य बनाने की माँग (महागुजरात आंदोलन और समान मराठी आंदोलन) के बाद संसद ने 1960 में कानून पास किया। 1 मई 1960 को कानून लागू हुआ और दोनों नए राज्य अस्तित्व में आए। गुजरात की पहली राजधानी अहमदाबाद थी (बाद में गांधीनगर बनी)। कैसे मनाया जाता है? गुजरात में सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोक नृत्य (गरबा, रास), संगीत, प्रदर्शनियाँ और सरकारी आयोजन होते हैं। अहमदाबाद के साबरमती रिवरफ्रंट जैसे स्थानों पर मुख्य कार्यक्रम होते हैं। लोग राज्य की उपलब्धियों, संस्कृति, उद्यमशीलता और गौरव पर चर्...

भिवंडी निजामपूर शहर महानगरपालिका, भिवंडी जिल्हा - ठाणे. दिनांक:- 01/05/2026. महानगरपालिकेतर्फे महाराष्ट्र राज्याच्या ६७ वा स्थापाना दिन व आंतरराष्ट्रीय कामगार दिन साजरा.

 भिवंडी निजामपूर शहर महानगरपालिका, भिवंडी जिल्हा - ठाणे. दिनांक:- 01/05/2026. महानगरपालिकेतर्फे महाराष्ट्र राज्याच्या ६७ वा स्थापाना दिन व आंतरराष्ट्रीय कामगार दिन साजरा.    आज दि. 01-05-2026 रोजी महाराष्ट्र राज्याचा ६७ स्थापना दिन व आंतरराष्ट्रीय कामगार दिनानिमित्त मा. महापौर श्री. नारायण रतन चौधरी, यांचे शुभहस्ते राष्ट्र ध्वजवंदन करण्यात आले.   तदनंतर महानगरपालिकेच्या प्रांगणातील डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या पुर्णाकृती पुतळ्यास मा. महापौर श्री. नारायण रतन चौधरी व मा. आयुक्त श्री अनमोल सागर (भा.प्र.से.) यांचे शुभहस्ते पुष्पहार अर्पण करुन त्यांना अभिवादन करण्यात आले. तसेच जुनी प्रशासकीय इमारती समोरील डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या अर्धपुतळ्यास मा. उप-महापौर तारीक अब्दुल बारी मोमीन व मा नगरसेवक फराज (बाबा) बहाउद्दीन यांच्या शुभहस्ते पुष्पहार अर्पण करुन त्यांना अभिवादन करण्यात आले.     तसेच जनगणना २०२६ या कार्यक्रमाअंतर्गत स्वगणना चे शुभारंभ मा. महापौर, उप- महापौर, मा आयुक्त, यांच्या शुभहस्ते करण्यात आला. तसेच याप्रसंगी मा नगरसेवक श्री. प्रशांत लाड, फराज...

एक बार गणेशजी ने भगवान शिवजी से कहा,

 एक बार गणेशजी ने भगवान शिवजी से कहा, पिताजी ! आप यह चिताभस्म लगाकर, मुण्डमाला धारणकर अच्छे नहीं लगते, मेरी माता गौरी अपूर्व सुंदरी और आप उनके साथ इस भयंकर रूप में ! पिताजी आप एक बार कृपा करके अपने सुंदर रूप में माता के सम्मुख आएं, जिससे हम आपका असली स्वरूप देख सकें ! भगवान शिवजी ने गणेशजी की बात मान ली ! कुछ समय बाद जब शिवजी स्नान करके लौटे तो उनके शरीर पर भस्म नहीं थी , बिखरी जटाएं सँवरी हुई, मुण्डमाला उतरी हुई थी ! सभी देवता, यक्ष, गंधर्व, शिवगण उन्हें अपलक देखते रह गये, वो ऐसा रूप था कि मोहिनी अवतार रूप भी फीका पड़ जाये ! भगवान शिव ने अपना यह रूप कभी प्रकट नहीं किया था ! शिवजी का ऐसा अतुलनीय रूप कि करोड़ों कामदेव को भी मलिन कर रहा था ! गणेशजी अपने पिता की इस मनमोहक छवि को देखकर स्तब्ध रह गए और मस्तक झुकाकर बोले -* *मुझे क्षमा करें पिताजी, परन्तु अब आप अपने पूर्व स्वरूप को धारण कर लीजिए ! भगवान शिव ने पूछा - क्यों पुत्र अभी तो तुमने ही मुझे इस रूप में देखने की इच्छा प्रकट की थी, अब पुनः पूर्व स्वरूप में आने की बात क्यों ? गणेशजी ने मस्तक झुकाये हुए ही कहा - क्षमा करें पिताश्री मेर...

उड़ीसा के एक गाँव में बंधु मोहंती नाम के व्यक्ति रहते थे। वे बहुत ही गरीब थे और केवल भिक्षा माँग कर अपना व परिवार का पोषण करते थे।

 उड़ीसा के एक गाँव में बंधु मोहंती नाम के व्यक्ति रहते थे। वे बहुत ही गरीब थे और केवल भिक्षा माँग कर अपना व परिवार का पोषण करते थे।  ये नित्य सत्संग के लिए जाया करते थे और इस से इनके मन में संकल्प बना कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य है भगवद् प्राप्ति करना। इसलिए ये भिक्षा को भी ज़्यादा महत्व नहीं देते थे।  बस पेट भरने के लिए दो-चार घरों से भिक्षा का प्रयास करते, यदि ना मिले तो उपवास कर लेते और एकांत में खूब नाम कीर्तन करते। उन्होंने अपनी पत्नी को भी जीवन का परम लाभ समझाते हुए अपने साथ नाम कीर्तन करने को कहा। अब दोनों पात पत्नी साथ में भजन करने लगे।  बंधु के हृदय में विकलता आने लगी कि अब मुझे भगवान ज़रूर मिलेंगे। अब उन्हें किसी परिवार, मित्र, संबंधी आदि से मिलना अच्छा नहीं लग रहा था। उनकी हालत बहुत ही दयनीय थी। उनके पास बिलकुल भी धन नहीं था और भिक्षा से भी अन्न कभी-कभी ही मिलता था। उनके पास पहनने को फटे, पुराने और गाँठ बंधे हुए कपड़े ही थे। जब कई दिनों तक भोजन नहीं मिला तो उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि यदि तुम साथ दो तो हम मेरे एक मित्र के पास जा सकते हैं। मेरा मित्र बहुत...

हिमालय की गोद में बसा एक छोटा सा गाँव था, जहाँ एक गरीब भक्त रहता था। उसका नाम था गोपाल। उसके पास न धन था, न साधन, लेकिन उसके हृदय में भगवान शिव के लिए अटूट प्रेम था।

 हिमालय की गोद में बसा एक छोटा सा गाँव था, जहाँ एक गरीब भक्त रहता था। उसका नाम था गोपाल। उसके पास न धन था, न साधन, लेकिन उसके हृदय में भगवान शिव के लिए अटूट प्रेम था। हर दिन वह शिवलिंग पर जल चढ़ाता और एक ही प्रार्थना करता—“हे भोलेनाथ, मुझे अपने चरणों तक पहुँचा दो।” एक दिन उसने निश्चय किया कि वह कैलाश पर्वत पर जाकर स्वयं महादेव के दर्शन करेगा। गाँव वालों ने उसे रोका—“यह मार्ग कठिन है, तुम वहाँ नहीं पहुँच पाओगे।” लेकिन गोपाल की भक्ति अडिग थी। वह नंगे पैर, बिना भोजन-पानी के, केवल “ॐ नमः शिवाय” का जाप करते हुए चल पड़ा। रास्ता बेहद कठिन था—बर्फीली हवाएँ, ऊँचे पहाड़, और खतरनाक रास्ते। कई बार वह गिरा, उसके पैर लहूलुहान हो गए, शरीर थक कर चूर हो गया। एक रात तो वह इतनी ठंड में गिर पड़ा कि लगा अब प्राण निकल जाएंगे। उसी क्षण उसने कमजोर आवाज़ में पुकारा—“हे शिव, अब मैं नहीं चल सकता… अगर सच्ची भक्ति है तो मुझे अपने पास बुला लो…” तभी एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। उसके सामने स्वयं भगवान शिव खड़े थे। उनके चेहरे पर करुणा और प्रेम था। उन्होंने गोपाल को उठाया और मुस्कुराकर कहा— “भक्त, तुम कैलाश नहीं आए… ...

एक बार की बात है। वृन्दावन में एक संत रहा करते थे। उनका नाम था कल्याण, वे बाँके बिहारी जी के परमभक्त थे। एक बार उनके पास एक सेठ आया, अब था तो सेठ... लेकिन कुछ समय से उसका व्यापार ठीक से नहीं चल रहा था।

 एक बार की बात है। वृन्दावन में एक संत रहा करते थे। उनका नाम था कल्याण, वे बाँके बिहारी जी के परमभक्त थे। एक बार उनके पास एक सेठ आया, अब था तो सेठ... लेकिन कुछ समय से उसका व्यापार ठीक से नहीं चल रहा था। उसको व्यापार में बहुत नुकसान हो रहा था। सेठ उन संत के पास गया और उनको अपनी सारी व्यथा बताई और और कहा, महाराज महाराज मेरे व्यापार में कुछ दिनों से काफी नुकसान हो रहा है आप कोई उपाय करियाँ संत ने कहा सेठ जी अगर मैं ऐसा कोई उपाय जानता तो आपको अवश्य बता देता। लेकिन मैं ऐसी कोई विद्या नहीं जानता जिससे मैं आपके व्यापार को ठीक कर सकु, ये मेरे बस में नहीं है। हमारा तो एक ही सहारा है, बिहारी जी.... इतनी बात हो ही पाई थी, कि बिहारी जी के मंदिर खुलने का समय हो गया। संत सेठ जी को बिहारी जी के मंदिर में ले आये और अपने हाँथ को बिहारी जी की ओर करते हुए सेठ जी को बोले, आपको जो कुछ भी मांगना है... जो कुछ भी कहना है... इनसे कह दो। अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह  ये सबकी कामनाओं को पूर्ण कर देते है। सेठ जी ने बिहारी जी से प्रार्थना की, दो चार दिन वृन्...

रावण पर विजय प्राप्त करने और भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद, विभीषण अयोध्या में रुक गए थे। जब उनके वापस लंका जाने का समय आया, तो श्री राम ने उन्हें अपने कुल देवता 'श्री रंगनाथ' की दिव्य विग्रह (मूर्ति) उपहार स्वरूप दी। यह वही मूर्ति थी जिसकी पूजा इक्ष्वाकु वंश के राजा सदियों से करते आ रहे थे।

 रावण पर विजय प्राप्त करने और भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद, विभीषण अयोध्या में रुक गए थे। जब उनके वापस लंका जाने का समय आया, तो श्री राम ने उन्हें अपने कुल देवता 'श्री रंगनाथ' की दिव्य विग्रह (मूर्ति) उपहार स्वरूप दी। यह वही मूर्ति थी जिसकी पूजा इक्ष्वाकु वंश के राजा सदियों से करते आ रहे थे। विग्रह सौंपते समय भगवान राम ने विभीषण को एक महत्वपूर्ण चेतावनी दी:  "विभीषण, इस विग्रह को तुम जहाँ भी एक बार धरती पर रख दोगे, यह वहीं स्थापित हो जाएगी। फिर इसे हिलाया नहीं जा सकेगा।" विभीषण उस मूर्ति को लेकर दक्षिण की ओर चल दिए। लेकिन देवताओं को चिंता हुई कि इतनी पवित्र और प्रभावशाली मूर्ति यदि लंका चली गई, तो भारत की आध्यात्मिक शक्ति कम हो जाएगी। देवताओं ने इसके समाधान के लिए प्रथम पूज्य भगवान गणेश (विनायक) से प्रार्थना की। विभीषण जब कावेरी नदी के तट पर पहुँचे, तो वे संध्यावंदन और स्नान करना चाहते थे। विग्रह को हाथ में लेकर स्नान करना संभव नहीं था, और वे उसे नीचे रख नहीं सकते थे। तभी वहाँ गणेश जी एक छोटे बालक का रूप धरकर आए। विभीषण ने उस बालक पर विश्वास करके विग्रह उसे थमा दिय...

श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णित 'गजेंद्र मोक्ष' की कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव के अहंकार, संसार के मोह और अंततः ईश्वर की शरणागति का एक अद्भुत दर्शन है।

 श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णित 'गजेंद्र मोक्ष' की कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव के अहंकार, संसार के मोह और अंततः ईश्वर की शरणागति का एक अद्भुत दर्शन है। आइए इस पावन कथा को विस्तार से समझते हैं: त्रिकूट पर्वत और गजेंद्र का वैभव क्षीरसागर के बीच में एक अत्यंत सुंदर त्रिकूट पर्वत था। उसकी तलहटी में एक बहुत बड़ा और शक्तिशाली हाथियों का राजा रहता था, जिसका नाम था गजेंद्र। वह इतना बलवान था कि उसकी गंध मात्र से शेर और व्याघ्र जैसे हिंसक जीव भी दूर भाग जाते थे। एक दिन गजेंद्र अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ विहार करते हुए प्यास बुझाने के लिए एक विशाल सरोवर के पास पहुँचा। वह अपनी शक्ति के मद (अहंकार) में चूर था और सरोवर के जल में खूब क्रीड़ा करने लगा। काल रूपी 'ग्राह' का आक्रमण जब गजेंद्र अपनी पत्नियों को अपनी सूंड से जल छिड़क कर नहला रहा था, तभी अचानक एक बहुत बड़े और शक्तिशाली मगरमच्छ (ग्राह) ने पानी के भीतर से उसका पैर पकड़ लिया।  * संघर्ष: गजेंद्र और ग्राह के बीच भयानक युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध एक-दो दिन नहीं, बल्कि एक हजार वर्षों तक चला।  *...

राष्ट्रीय लोक सेवा दिवस (या राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस) हर वर्ष 21 अप्रैल को भारत में मनाया जाता है। यह दिन देश की सिविल सेवाओं (IAS, IPS, IFS आदि) में कार्यरत लोक सेवकों के समर्पण, कड़ी मेहनत और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को सम्मानित करने के लिए समर्पित है।

 राष्ट्रीय लोक सेवा दिवस (या राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस) हर वर्ष 21 अप्रैल को भारत में मनाया जाता है। यह दिन देश की सिविल सेवाओं (IAS, IPS, IFS आदि) में कार्यरत लोक सेवकों के समर्पण, कड़ी मेहनत और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को सम्मानित करने के लिए समर्पित है।  इतिहास 21 अप्रैल 1947 को स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने दिल्ली के मेटकाफ हाउस में प्रशासनिक सेवाओं के पहले बैच के परिवीक्षार्थी अधिकारियों को संबोधित किया था। उन्होंने सिविल सेवकों को "भारत का स्टील फ्रेम" (Steel Frame of India) कहा था, जो आज भी उनकी मजबूत और निष्ठावान भूमिका का प्रतीक है। इसी ऐतिहासिक घटना की याद में 2006 से हर साल 21 अप्रैल को राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस मनाया जाने लगा। पहला समारोह विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित हुआ था।  महत्व यह दिवस सिविल सेवकों को नागरिकों की सेवा में अपनी प्रतिबद्धता को नवीनीकृत करने का अवसर प्रदान करता है। यह भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले अधिकारियों के योगदान को रेखांकित करता है, जो नीति निर्माण, विकास योजनाओं के क्रियान्वयन औ...

तेली समाज के गौरव, राष्ट्र के गौरव, दानवीर भामाशाह जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन! 🙏

 भामाशाह (1547–1600) भारतीय इतिहास के एक महान दानवीर, सेनापति, मंत्री और महाराणा प्रताप के विश्वासपात्र सहयोगी थे। वे मेवाड़ राज्य (राजस्थान) के उद्धार और स्वाभिमान की रक्षा में अपनी पूरी संपत्ति समर्पित करने के लिए प्रसिद्ध हैं।  जन्म और पृष्ठभूमि जन्म: 28 जून 1547 (कुछ स्रोतों में 29 अप्रैल 1547) को मेवाड़ राज्य में, वर्तमान पाली जिले के सादड़ी गांव या चित्तौड़गढ़ क्षेत्र में। परिवार: पिता — भारमल कावड़िया (रणथम्भौर दुर्ग के किलेदार, राणा सांगा द्वारा नियुक्त; बाद में राणा उदय सिंह के प्रधानमंत्री)। माता — कर्पूरदेवी। वे ओसवाल जैन समुदाय (कावड़िया/कांवड़िया गोत्र) से थे और जैन धर्म के अनुयायी थे। उनके पिता की वजह से बाल्यकाल से ही मेवाड़ के शासकों से निकट संबंध था। महाराणा प्रताप के साथ योगदान भामाशाह महाराणा प्रताप के बचपन के मित्र, सलाहकार और सेनापति थे। हल्दीघाटी के युद्ध (1576) के बाद मेवाड़ की स्थिति बहुत खराब हो गई थी — सेना बिखरी हुई थी, संसाधन खत्म हो चुके थे और महाराणा प्रताप परिवार सहित जंगलों-पहाड़ियों में भटक रहे थे। इस कठिन समय में भामाशाह ने अपनी सारी व्यक्तिगत...

विश्व धरोहर दिवस (World Heritage Day) आज 18 अप्रैल 2026 को मनाया जा रहा है। इसे अंतरराष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस (International Day for Monuments and Sites) भी कहते हैं।

विश्व धरोहर दिवस (World Heritage Day) आज 18 अप्रैल 2026 को मनाया जा रहा है। इसे अंतरराष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस (International Day for Monuments and Sites) भी कहते हैं। 2026 की थीम (Theme): "Emergency Response for Living Heritage in contexts of Conflicts and Disasters" (हिंदी में: संघर्षों और आपदाओं के संदर्भ में जीवित विरासत के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया) इस थीम का मतलब है कि युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं (जैसे भूकंप, बाढ़) या अन्य संकटों के समय हमारी जीवित सांस्कृतिक विरासत (living heritage) — जैसे परंपराएं, लोक कला, त्योहार, मौखिक इतिहास और समुदायों से जुड़ी सांस्कृतिक प्रथाएं — को कैसे तुरंत बचाया जाए और संरक्षित किया जाए। यह दिवस क्यों मनाया जाता है? 1982 में ICOMOS (International Council on Monuments and Sites) ने इसकी शुरुआत की। 1983 में UNESCO ने इसे आधिकारिक रूप से मंजूरी दी। उद्देश्य: दुनिया भर की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों के बारे में जागरूकता फैलाना, उनकी कमजोरियों को समझना और संरक्षण के प्रयासों को बढ़ावा देना। भारत में कई यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं, जैसे ताज...

17 अप्रैल — डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की पुण्यतिथि “शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण होना चाहिए”

 17 अप्रैल — डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की पुण्यतिथि “शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण होना चाहिए” यह विचार भारत के महान दार्शनिक, शिक्षाविद्, पूर्व राष्ट्रपति और भारतरत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी का है। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें कोटि-कोटि श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। डॉ. राधाकृष्णन का योगदान डॉ. राधाकृष्णन एक प्रख्यात दार्शनिक थे, जिन्होंने भारतीय दर्शन और पाश्चात्य दर्शन दोनों को गहराई से समझा और जोड़ा। वे शिक्षक के सम्मान के प्रतीक बने, यही कारण है कि उनका जन्मदिन 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनका मानना था कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान या डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं है। सच्ची शिक्षा वह है जो व्यक्ति के चरित्र, नैतिकता, मूल्यों और व्यक्तित्व का निर्माण करती है। बिना चरित्र के ज्ञान अधूरा और कभी-कभी खतरनाक भी हो सकता है। उनके प्रमुख विचार शिक्षा का मुख्य लक्ष्य मनुष्य को अच्छा इंसान बनाना है, न कि सिर्फ नौकरी या धन कमाने का साधन। शिक्षक को केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि छात्रों के जीवन का मार्गदर्शक होना चाहिए। भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता को...

बाबासाहेब डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर जी (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956) भारत के महानतम समाज सुधारक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता थे। उन्हें प्यार से बाबासाहेब कहा जाता है। वे दलितों (तत्कालीन अछूतों) के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले नेता, समानता, स्वतंत्रता और न्याय के प्रतीक थे।

 बाबासाहेब डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर जी (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956) भारत के महानतम समाज सुधारक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता थे। उन्हें प्यार से बाबासाहेब कहा जाता है। वे दलितों (तत्कालीन अछूतों) के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले नेता, समानता, स्वतंत्रता और न्याय के प्रतीक थे। प्रारंभिक जीवन डॉ. आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू (अब डॉ. अंबेडकर नगर) में हुआ था। वे महार जाति (दलित समुदाय) से थे और अपने माता-पिता रामजी मालोजी सकपाल (सूबेदार, भारतीय सेना) तथा भीमाबाई की 14वीं संतान थे। बचपन में उन्हें जातिगत भेदभाव का कड़ा सामना करना पड़ा—स्कूल में अलग बैठना, पानी न पीने देना आदि। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और शिक्षा पर जोर दिया। शिक्षा और विदेश यात्रा 1912-13 में बॉम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में स्नातक। बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ की छात्रवृत्ति से कोलंबिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) गए, जहां 1915 में एम.ए. और 1917 में पीएचडी (अर्थशास्त्र) पूरी की। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ...

आज 8 अप्रैल को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जी की पुण्यतिथि (स्मृतिदिन) है।

 आज 8 अप्रैल को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जी की पुण्यतिथि (स्मृतिदिन) है। संक्षिप्त जीवन परिचय जन्म: 26/27 जून 1838, नैहाटी (या कांठलपाड़ा), बंगाल प्रेसिडेंसी (वर्तमान पश्चिम बंगाल)। निधन: 8 अप्रैल 1894, कोलकाता में 55 वर्ष की आयु में (मधुमेह की जटिलताओं के कारण)। वे बांग्ला साहित्य के महान उपन्यासकार, कवि, निबंधकार और पत्रकार थे। उन्हें बांग्ला साहित्य का “साहित्य सम्राट” भी कहा जाता है। प्रमुख योगदान उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना “आनंदमठ” (1882) उपन्यास है, जिसमें “वंदे मातरम्” गान शामिल है। यह गान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरणास्रोत बना और आज भारत का राष्ट्रीय गीत है। अन्य प्रमुख रचनाएँ: दुर्गेशनंदिनी कपालकुंडला विषबृक्ष कृष्णकांतेर विल राजसिंह देवी चौधुरानी रजनी उनके उपन्यासों में राष्ट्रवाद, सामाजिक सुधार और बंगाल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भावना प्रमुख रूप से दिखती है। वे आधुनिक बांग्ला उपन्यास के जनक माने जाते हैं। आज की याद आज उनकी पुण्यतिथि पर देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। उनकी लेखनी ने न केवल बांग्ला साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि स्वाधीनता आंदोलन में लाखों भार...