रावण पर विजय प्राप्त करने और भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद, विभीषण अयोध्या में रुक गए थे। जब उनके वापस लंका जाने का समय आया, तो श्री राम ने उन्हें अपने कुल देवता 'श्री रंगनाथ' की दिव्य विग्रह (मूर्ति) उपहार स्वरूप दी। यह वही मूर्ति थी जिसकी पूजा इक्ष्वाकु वंश के राजा सदियों से करते आ रहे थे।
रावण पर विजय प्राप्त करने और भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद, विभीषण अयोध्या में रुक गए थे। जब उनके वापस लंका जाने का समय आया, तो श्री राम ने उन्हें अपने कुल देवता 'श्री रंगनाथ' की दिव्य विग्रह (मूर्ति) उपहार स्वरूप दी। यह वही मूर्ति थी जिसकी पूजा इक्ष्वाकु वंश के राजा सदियों से करते आ रहे थे।
विग्रह सौंपते समय भगवान राम ने विभीषण को एक महत्वपूर्ण चेतावनी दी:
"विभीषण, इस विग्रह को तुम जहाँ भी एक बार धरती पर रख दोगे, यह वहीं स्थापित हो जाएगी। फिर इसे हिलाया नहीं जा सकेगा।"
विभीषण उस मूर्ति को लेकर दक्षिण की ओर चल दिए। लेकिन देवताओं को चिंता हुई कि इतनी पवित्र और प्रभावशाली मूर्ति यदि लंका चली गई, तो भारत की आध्यात्मिक शक्ति कम हो जाएगी। देवताओं ने इसके समाधान के लिए प्रथम पूज्य भगवान गणेश (विनायक) से प्रार्थना की।
विभीषण जब कावेरी नदी के तट पर पहुँचे, तो वे संध्यावंदन और स्नान करना चाहते थे। विग्रह को हाथ में लेकर स्नान करना संभव नहीं था, और वे उसे नीचे रख नहीं सकते थे। तभी वहाँ गणेश जी एक छोटे बालक का रूप धरकर आए।
विभीषण ने उस बालक पर विश्वास करके विग्रह उसे थमा दिया और कहा कि इसे नीचे मत रखना। लेकिन जैसे ही विभीषण जल में गए, बालक ने तीन बार पुकारा और विग्रह को वहीं भूमि पर रख दिया।
जब विभीषण वापस आए, तो उन्होंने देखा कि मूर्ति धरती से चिपक चुकी है। उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, क्रोधित होकर उस बालक (गणेश जी) का पीछा भी किया, लेकिन मूर्ति टस से मस नहीं हुई।
अंत में विभीषण को सत्य का आभास हुआ कि यह प्रभु की इच्छा ही थी। भगवान रंगनाथ वहीं कावेरी के तट पर रुकना चाहते थे। आज उसी स्थान को हम 'श्रीरंगम' (तमिलनाडु) के नाम से जानते हैं, जहाँ भगवान रंगनाथ का विशाल मंदिर स्थित है।
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