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श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णित 'गजेंद्र मोक्ष' की कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव के अहंकार, संसार के मोह और अंततः ईश्वर की शरणागति का एक अद्भुत दर्शन है।

 श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णित 'गजेंद्र मोक्ष' की कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव के अहंकार, संसार के मोह और अंततः ईश्वर की शरणागति का एक अद्भुत दर्शन है।



आइए इस पावन कथा को विस्तार से समझते हैं:

त्रिकूट पर्वत और गजेंद्र का वैभव

क्षीरसागर के बीच में एक अत्यंत सुंदर त्रिकूट पर्वत था। उसकी तलहटी में एक बहुत बड़ा और शक्तिशाली हाथियों का राजा रहता था, जिसका नाम था गजेंद्र। वह इतना बलवान था कि उसकी गंध मात्र से शेर और व्याघ्र जैसे हिंसक जीव भी दूर भाग जाते थे।

एक दिन गजेंद्र अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ विहार करते हुए प्यास बुझाने के लिए एक विशाल सरोवर के पास पहुँचा। वह अपनी शक्ति के मद (अहंकार) में चूर था और सरोवर के जल में खूब क्रीड़ा करने लगा।

काल रूपी 'ग्राह' का आक्रमण

जब गजेंद्र अपनी पत्नियों को अपनी सूंड से जल छिड़क कर नहला रहा था, तभी अचानक एक बहुत बड़े और शक्तिशाली मगरमच्छ (ग्राह) ने पानी के भीतर से उसका पैर पकड़ लिया।

 * संघर्ष: गजेंद्र और ग्राह के बीच भयानक युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध एक-दो दिन नहीं, बल्कि एक हजार वर्षों तक चला।

 * परिणाम: पानी के भीतर मगरमच्छ की शक्ति बढ़ती गई और गजेंद्र का बल धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। जब उसके परिवार और साथियों ने देखा कि गजेंद्र हार रहा है, तो वे भी एक-एक कर उसे अकेला छोड़कर चले गए।

अहंकार का पतन और पुकार

जब गजेंद्र बिल्कुल असहाय हो गया और उसका शरीर पानी में डूबने लगा, तब उसे बोध हुआ कि संसार का कोई भी संबंधी या शारीरिक बल उसे मृत्यु से नहीं बचा सकता। उसका अहंकार टूट गया।

तब उसे अपने पूर्व जन्म (राजा इंद्रद्युम्न) के पुण्य से भगवान विष्णु की स्तुति याद आई। उसने सरोवर से एक कमल का फूल अपनी सूंड में लिया, उसे ऊपर की ओर उठाया और अत्यंत आर्त स्वर (दुख भरी पुकार) में भगवान को पुकारा:

 "नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायैद्भुतकारणाय..."

(हे समस्त जगत के कारण, हे निराकार प्रभु! मैं आपकी शरण में हूँ।)


भगवान का आगमन और उद्धार

जैसे ही गजेंद्र ने हृदय से पुकारा, भगवान विष्णु वैकुंठ में अपनी सभा छोड़कर नंगे पैर दौड़ पड़े। वे गरुड़ पर सवार होकर तुरंत उस सरोवर पर पहुंचे।

 * करुणा: भगवान ने देखा कि गजेंद्र डूब रहा है। उन्होंने अपनी करुणा से उसे जल से बाहर निकाला।

 * चक्र का प्रहार: भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का मुख फाड़ दिया और गजेंद्र को उसके चंगुल से मुक्त किया।

 * पूर्व जन्म का रहस्य: वह मगरमच्छ वास्तव में 'हूहू' नाम का गंधर्व था जिसे श्राप मिला था, और गजेंद्र 'इंद्रद्युम्न' नाम का राजा था। भगवान के स्पर्श से दोनों का उद्धार हो गया।

इस कथा का गहरा अर्थ 

 * सरोवर: यह संसार है।

 * गजेंद्र: हम सभी जीव हैं, जो अपने बल और परिवार के मोह में डूबे हैं।

 * ग्राह (मगरमच्छ): यह 'काल' या मृत्यु है, जिसने हमें पैरों से पकड़ रखा है।

 * शिक्षा: जब तक हम अपनी शक्ति पर भरोसा करते हैं, भगवान प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन जिस क्षण हम मान लेते हैं कि "प्रभु, अब मैं हार गया, केवल आप ही सहारा हो," उसी क्षण वे प्रकट हो जाते हैं।

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