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क्रोध भैरव (Krodha Bhairav): अष्ट भैरवों में चतुर्थ स्वरूप

 क्रोध भैरव (Krodha Bhairav): अष्ट भैरवों में चतुर्थ स्वरूप



भगवान शिव के आठ रौद्र रूपों (अष्ट भैरव) में क्रोध भैरव का स्थान चौथा है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह स्वरूप 'क्रोध' का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन यह क्रोध विध्वंसक न होकर "धर्म की रक्षा" और "अज्ञान के नाश" के लिए है। तंत्र मार्गी और अघोर साधक इन्हें विशेष रूप से कठिन बाधाओं और शत्रुओं के निवारण के लिए पूजते हैं।


क्रोध भैरव के स्वरूप, साधना, मंत्र और तांत्रिक महत्व का विस्तृत जानकारी है:


1. परिचय एवं स्वरूप (Identity and Form)

क्रोध भैरव का स्वरूप अत्यंत उग्र और शक्तिशाली माना जाता है। इनका संबंध भगवान विष्णु की शक्ति से भी जोड़ा जाता है।

 • दिशा: दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण)। वास्तु में इस दिशा के स्वामी होने के कारण घर में भारीपन या पितृ दोष होने पर इनकी साधना की जाती है।

 • सवारी (वाहन): गरुड़ (Eagle)। चूँकि गरुड़ भगवान विष्णु का वाहन है, यह शैव और वैष्णव मत का एक अद्भुत संगम दर्शाता है।

 • रंग: धूम्र वर्ण (धुएं जैसा गहरा नीला/काला)।

 • संगिनी (शक्ति): माँ वैष्णवी।

 • ग्रह: शनि (Saturn)। कुण्डली में शनि दोष निवारण के लिए इनकी उपासना अचूक मानी जाती है।

 • अस्त्र-शस्त्र: इनके तीन नेत्र हैं। ये अपने हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म (कमल) धारण करते हैं (जो विष्णु के भी आयुध हैं), साथ ही एक हाथ में खड्ग (तलवार) भी होती है।


2. विभिन्न संप्रदायों में मत (Tantric Perspectives)

- अघोर तंत्र (Aghor Tantra):

अघोरियों के लिए क्रोध भैरव केवल गुस्से के देवता नहीं हैं, बल्कि वे "कालाग्नि" के प्रतीक हैं। अघोर मत के अनुसार, साधक अपने भीतर के अनियंत्रित क्रोध को क्रोध भैरव की साधना के माध्यम से 'तेज' और 'संकल्प शक्ति' में बदल देता है। यह साधना शमशान या एकांत में की जाती है ताकि साधक निडर बन सके।


- कौल तंत्र (Kaul Tantra):

कौल मार्ग में क्रोध भैरव और उनकी शक्ति वैष्णवी की युगल उपासना का महत्व है। यह मूलाधार और मणिपूर चक्र के बीच की ऊर्जा को संतुलित करने के लिए की जाती है। कौल साधक मानते हैं कि जब तक क्रोध शुद्ध नहीं होता, तब तक मोक्ष का द्वार नहीं खुलता।


3. साधना विधान (Siddhi Sadhana Vidhan)

चेतावनी: उग्र भैरव साधना किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करनी चाहिए। यहाँ दी गई जानकारी केवल ज्ञानवर्धन हेतु है।


 • शुभ समय: कृष्ण पक्ष की अष्टमी (कालाष्टमी), रविवार या मंगलवार की मध्य रात्रि।

 • वस्त्र व आसन: नीला या काला वस्त्र और आसन।

 • दीपक: सरसों के तेल का चौमुखी दीपक (दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुख करके)।

 • भोग (नैवेद्य): उड़द की दाल के बड़े, गुड़, या बेसन के लड्डू। अघोर पद्धति में मदिरा का भी विधान है (सात्विक साधक केवल सात्विक भोग लगाएं)।

 • दिशा: दक्षिण-पश्चिम (South-West) की ओर मुख करके बैठें।


पूजन विधि:

 • सर्वप्रथम गुरु और गणपति का पूजन करें।

 • क्षेत्रपाल और बटुक भैरव का मानसिक नमन करें।

 • क्रोध भैरव के चित्र या यंत्र को स्थापित करें।

 • नीले पुष्प और अक्षत अर्पित करें।


4. मंत्र (Mantra)

साधना के उद्देश्य के अनुसार मंत्र भिन्न हो सकते हैं।

सामान्य जाप मंत्र (सुरक्षित और प्रभावी):

 ।। ॐ ह्रीं क्रोध भैरवाय नमः ।।

 (Om Hreem Krodha Bhairavaya Namah)


गायत्री मंत्र:

।। ॐ कृष्णवर्णाय विद्महे, लक्ष्मीधराय धीमहि, तन्नो क्रोध भैरव प्रचोदयात् ।।

(जाप संख्या: संकल्प लेकर कम से कम 11, 21 या 51 माला रुद्राक्ष से करें)


5. लाभ और हानि (Benefits and Risks)

लाभ (Benefits):

 • विपत्ति नाश: जब जीवन में चारों तरफ से रास्ते बंद हो जाएं, तो क्रोध भैरव तत्काल मार्ग खोलते हैं।

 • शत्रु बाधा: गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं का दमन होता है।

 • ग्रह शांति: विशेषकर शनि और राहु-केतु के दुष्प्रभावों को शांत करते हैं।

 • निर्णय क्षमता: साधक के भीतर सही समय पर सही 'क्रोध' या कठोर निर्णय लेने की क्षमता आती है।

 • नेत्र रोग: प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, इनकी साधना से नेत्र ज्योति और दृष्टि दोष में लाभ होता है।


हानि/सावधानियां (Risks):

 • दिशा का ध्यान: यदि दक्षिण-पश्चिम दिशा दूषित है और आप बिना सुरक्षा घेरे के साधना करते हैं, तो मानसिक अस्थिरता आ सकती है।

 • अहंकार: साधना के बाद यदि साधक अपने क्रोध पर नियंत्रण खो देता है, तो यह शक्ति उसी का नाश कर सकती है।

 • गलत उद्देश्य: किसी का अहित करने के उद्देश्य से की गई साधना पलटकर साधक को ही बीमार कर सकती है।


6. विशेष टोटका (Remedy)

यदि घर में बहुत क्लेश रहता हो या शत्रु हावी हों, तो रविवार की रात क्रोध भैरव का स्मरण करते हुए एक कागज़ पर शत्रु का नाम (काली स्याही से) लिखकर उसे सरसों के तेल में डुबोकर जला दें और राख को घर से बाहर फेंक दें।


•••क्रोध भैरव यंत्र निर्माण विधि•••


तंत्र शास्त्र में यंत्र को देवता का 'शरीर' और मंत्र को 'आत्मा' माना जाता है। क्रोध भैरव का यंत्र अत्यंत शक्तिशाली होता है, जो विशेष रूप से शत्रु स्तम्भन (शत्रुओं को रोकने), सुरक्षा और शनि दोष निवारण के लिए बनाया जाता है।


यहाँ अघोर और सात्विक दोनों पद्धतियों के मिश्रण से सिद्ध यंत्र निर्माण की विधि दी जा रही है।


1. आवश्यक सामग्री (Materials Required)

यंत्र निर्माण के लिए शुद्ध और प्राणवान सामग्री का होना आवश्यक है:

 • आधार (Surface): श्रेष्ठ तो यह है कि इसे ताम्र पत्र (Copper Plate) पर खुदवाया जाए। यदि यह संभव न हो, तो भोजपत्र का उपयोग करें। (कागज का प्रयोग तांत्रिक कार्यों में कम प्रभावी माना जाता है)।

 • स्याही (Ink):

   • सात्विक विधि: अष्टगंध, कुमकुम और गंगाजल मिलाकर।

   • तामसिक/अघोर विधि: रक्त चंदन (लाल चंदन), कस्तूरी, और धतूरे के रस का मिश्रण। यदि शत्रु बाधा बहुत अधिक है, तो शमशान की राख (भस्म) का भी सूक्ष्म प्रयोग स्याही में किया जाता है।

 • लेखनी (Pen): अनार (Pomegranate) या चमेली की कलम।

 • समय (Timing): कृष्ण पक्ष की अष्टमी, शनिवार की रात्रि, या ग्रहण काल।


2. यंत्र की ज्यामिति (Geometry of the Yantra)

क्रोध भैरव यंत्र की संरचना में मुख्य रूप से त्रिकोण और अष्टदल कमल का महत्व है। इसे बनाने का क्रम (अंदर से बाहर की ओर) इस प्रकार है:

 • बिंदु (Center): सबसे मध्य में एक बिंदु होता है जो शिव का प्रतीक है।

 • त्रिकोण (Triangle): बिंदु के चारों ओर एक उल्टा त्रिकोण (शक्ति त्रिकोण - जिसका नोक नीचे की ओर हो) बनाएं।

 • वृत्त (Circle): त्रिकोण के बाहर एक गोलाकार वृत्त बनाएं।

 • अष्टदल (8 Petals): वृत्त के ऊपर 8 कमल की पंखुड़ियाँ बनाएं। ये अष्ट भैरवों या अष्ट मातृकाओं का प्रतीक हैं।

 • भूपुर (Bhupura): सबसे बाहर एक चौकोर घेरा (वर्ग) बनाएं जिसमें चार द्वार (T आकार के) खुले हों।


3. बीजाक्षर लेखन (Writing the Mantras)

यंत्र की आकृति बनाने के बाद उसमें 'प्राण' डालने के लिए विशिष्ट बीजाक्षरों को लिखा जाता है। यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है:

 • मध्य बिंदु: बिंदु के स्थान पर क्रोध भैरव का बीज मंत्र "क्रों" (Krom) या "ह्रीं" (Hrim) लिखें। (यदि किसी विशेष शत्रु से रक्षा चाहिए, तो बिंदु के नीचे शत्रु का नाम बहुत छोटे अक्षरों में लिखा जा सकता है, लेकिन सामान्य सुरक्षा के लिए केवल "क्रों" लिखें)।


 • त्रिकोण के कोने: त्रिकोण के तीनों कोनों में "क्लीं" (Kleem) लिखें।

 • अष्टदल (पंखुड़ियाँ): आठों पंखुड़ियों में घड़ी की दिशा (Clockwise) में भैरव के आठ नाम या "भं" बीज मंत्र लिखें।

  • क्रम: असितांग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण, संहार।

 • भूपुर: बाहरी चौकोर घेरे के चारों कोनों में "ॐ" लिखें।


4. प्राण-प्रतिष्ठा और सक्रियकरण (Activation Ritual)

यंत्र केवल रेखाओं का जाल है जब तक कि उसमें प्राण-प्रतिष्ठा न की जाए।

 • शुद्धिकरण: यंत्र को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) और फिर गंगाजल से धोएं (यदि भोजपत्र पर है तो केवल गंगाजल के छींटे दें)।

 • धूप-दीप: यंत्र को लकड़ी की चौकी पर नीला कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं और गुग्गुल की धूप दें।

 • जाप: रुद्राक्ष की माला से यंत्र के सामने बैठकर क्रोध भैरव के मंत्र की कम से कम 5 माला जाप करें:

 ।। ॐ ह्रीं क्रोध भैरवाय नमः ।।

    या

 ।। ॐ क्रों क्रोध भैरवाय फट ।।

   

 • हवन (वैकल्पिक): यंत्र के ऊपर से 7 बार उड़द के दाने घुमाकर अग्नि में डालने से यंत्र तत्काल जाग्रत हो जाता है।


5. यंत्र का उपयोग और स्थापना (Placement)

 • दिशा: इस यंत्र को घर या कार्यालय के दक्षिण-पश्चिम (South-West) कोने में स्थापित करें। यह दिशा 'राहु-केतु' और पितरों की भी है, जिसे क्रोध भैरव नियंत्रित करते हैं।

 

• धारण करना: यदि भोजपत्र पर छोटा यंत्र बनाया है, तो उसे तांबे या चांदी के ताबीज (Kavach) में भरकर गले या दाहिनी भुजा में शनिवार को धारण किया जा सकता है।


सावधानी (Warning)

क्रोध भैरव यंत्र अत्यधिक ऊर्जावान होता है। इसे अपवित्र स्थान (जैसे बेडरूम) में खुला न रखें। यदि ताबीज पहना है, तो मदिरा-मांस के सेवन के समय या सूतक काल में इसे उतार दें।


क्रोध भैरव की साधना को राजकीय बाधा, कोर्ट-कचहरी (Legal disputes), और शत्रु भय को समाप्त करने के लिए तंत्र शास्त्र में सबसे अचूक माना गया है। चूँकि क्रोध भैरव 'शनि' और 'नैऋत्य दिशा' (South-West) के स्वामी हैं, और न्याय (Justice) का कारक भी शनि ही है, इसलिए इनकी पूजा कानूनी मामलों में पासा पलटने की क्षमता रखती है।

यहाँ कोर्ट केस और विशिष्ट समस्याओं के लिए क्रोध भैरव के कुछ गोपनीय और प्रभावी उपाय दिए जा रहे हैं:


1. कोर्ट केस में विजय हेतु (For Victory in Court Cases)

यह प्रयोग तब करें जब आपको लगता हो कि आप सच्चे हैं लेकिन विपक्षी षड्यंत्र रच रहा है या तारीख पर तारीख मिल रही है।

सामग्री: एक बेदाग पीला नींबू, 4 लौंग (फूल वाली), सिंदूर, और काला धागा।

विधि:

 • जिस दिन कोर्ट में सुनवाई (Hearing) हो, उस दिन सुबह स्नान करके क्रोध भैरव का स्मरण करें।

 • नींबू को अच्छी तरह धो लें। उसमें चारों दिशाओं का ध्यान करते हुए 4 लौंग गाड़ दें।

 • नींबू पर सिंदूर का टीका लगाएं और मन ही मन कहें: "हे क्रोध भैरव, मेरी रक्षा करें और अमुक (शत्रु का नाम) की कुबुद्धि का स्तम्भन करें।"

 • अब 11 बार "ॐ ह्रीं क्रोध भैरवाय नमः" मंत्र का जाप करें।

 • इस नींबू को अपनी जेब या बैग में रखकर कोर्ट जाएं।

 • महत्वपूर्ण: कोर्ट से वापस आते समय इस नींबू को किसी निर्जन स्थान (जहां कोई देखे नहीं) पर फेंक दें या बहते पानी में विसर्जित कर दें। पीछे मुड़कर न देखें।


2. कानूनी फाइलों के लिए यंत्र प्रयोग (Remedy for Case Files)

यह उपाय जज या वकील के मन को आपके पक्ष में (यदि आप सही हैं) करने के लिए किया जाता है।

विधि:

 • भोजपत्र का एक छोटा टुकड़ा लें।

 • अनार की कलम और अष्टगंध (या लाल चंदन) की स्याही से उस पर क्रोध भैरव का बीज मंत्र "क्रों" (Krom) लिखें।

 • इसे धूप-दीप दिखाकर अपने केस की फाइल के अंदर छिपाकर रख दें।

 • जब भी वकील से मिलने जाएं या कोर्ट जाएं, यह फाइल साथ रखें। यह नकारात्मक ऊर्जा को फाइल से दूर रखता है।


3. प्रबल शत्रु बाधा और भय निवारण (Protection from Enemies)

यदि शत्रु आपको कोर्ट के बाहर परेशान कर रहे हों या गुप्त शत्रु (Hidden Enemies) नुकसान पहुँचा रहे हों।

समय: शनिवार की रात्रि (अंधेरे के बाद)।

स्थान: घर का दक्षिण-पश्चिम (South-West) कोना या घर के मुख्य द्वार के बाहर।

विधि:

 • आटे का एक चौमुखी दीपक (चार बत्तियों वाला) बनाएं।

 • उसमें सरसों का तेल भरें और थोड़े से काले तिल डाल दें।

 • दीपक जलाकर क्रोध भैरव से प्रार्थना करें: "मेरे चारों ओर सुरक्षा का वज्र घेरा बनाएं।"

 • दीपक के सामने बैठकर "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं क्रोध भैरवाय शत्रु नाशाय फट" मंत्र का 108 बार (एक माला) जाप करें।

 • ऐसा लगातार 5 या 7 शनिवार करें। शत्रु शांत होकर समझौता करने पर विवश हो जाएगा।


4. अघोर/तीव्र उपाय (केवल विषम परिस्थिति के लिए)

यह उपाय अघोर परंपरा से प्रेरित है और इसका प्रयोग तभी करें जब स्थिति जीवन-मरण या प्रतिष्ठा पर आ जाए।

मदिरा नैवेद्य प्रयोग:

 • क्रोध भैरव को प्रसन्न करने के लिए रविवार की रात किसी भैरव मंदिर में जाएं।

 • उन्हें मदिरा (शराब) का भोग (धार) चढ़ाएं। (यदि आप मदिरा नहीं चढ़ा सकते, तो इमर्ती का भोग भी क्रोध भैरव को अत्यंत प्रिय है)।

 • भोग चढ़ाते समय प्रार्थना करें कि "मुकदमे में जो भी बाधाएं हैं, वे भस्म हों।"

 • वहाँ से थोड़ी सी भभूति (राख) लेकर आएं और सुनवाई के दिन उसे अपने माथे पर लगाकर जाएं।


 विशेष सावधानियां (Crucial Warnings)

 • सत्यता: भैरव "दंडनायक" हैं। यदि आप स्वयं अपराधी हैं और किसी निर्दोष को फंसाने के लिए यह पूजा कर रहे हैं, तो क्रोध भैरव का कोप आप पर ही उल्टा पड़ सकता है। यह उपाय केवल आत्मरक्षा और न्याय प्राप्ति के लिए है।

 • गोपनीयता: इन उपायों के बारे में किसी को बताएं नहीं (टोका-टाकी से प्रभाव कम हो जाता है)।

 • सात्विकता: जिस दिन उपाय करें, उस दिन स्वयं मांस-मदिरा का सेवन न करें (भले ही भैरव को भोग चढ़ाया हो, साधक को संयमित रहना चाहिए)।

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        संपादक श्री दयाशंकर गुुुप्ता जी




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