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अपना घर.....अपना घर" बहुत प्यारा और भावुक शब्द है। इसका मतलब होता है "अपना घर" या "my own home" — वो जगह जहाँ दिल की सुकून मिलता है, जहाँ परिवार है, यादें हैं, और जो सिर्फ़ हमारा होता है।

 "अपना घर" बहुत प्यारा और भावुक शब्द है। इसका मतलब होता है "अपना घर" या "my own home" — वो जगह जहाँ दिल की सुकून मिलता है, जहाँ परिवार है, यादें हैं, और जो सिर्फ़ हमारा होता है।



कई लोग इसे अलग-अलग संदर्भ में इस्तेमाल करते हैं:

सच्चा अर्थ — अपना घर वो नहीं जो किराए का हो या किसी और का, बल्कि वो जो खुद का हो, जहाँ हम बेझिझक रह सकें।

मुहावरा — "अपना घर समझना" यानी किसी के घर में ऐसे व्यवहार करना जैसे वो अपना ही घर हो — बिना झिझक के, आराम से।

बच्चों की कविताओं में — अक्सर "अपना घर है सबसे प्यारा" जैसी लाइन्स आती हैं, जहाँ चिड़िया के बच्चे, माँ-बाप, छत-आँगन सब मिलकर घर को खूबसूरत बनाते हैं।

एक छोटी-सी मशहूर कविता जैसी लाइन याद आ रही है:

अपना घर है सबसे प्यारा

चिड़िया के बच्चे चार

घूम-घूम कर खेलते हैं

माँ के पास आ जाते हैं...

आपका "अपना घर" कैसा है? 😊

क्या आप  नक्षत्र अपार्टमेंट,गोवा नाका,सरवली एमआयडीसी रोड, पिंपळघर. में रहते वो घर का पता हैं तो वहाँ का अपना घर कैसा लगता है — बारिश में छत की टप-टप, या शाम को चाय की खुशबू? बताइए ना! 🏡❤️

अपना घर......


पहले बिल्डर ने घर का सपना दिखाया।

सबसे पैसा बटोर खाया।

ज्यादा लालच से अहंकार हुआ ।

किया कराया बर्बाद हुआ ।।


लोगों की हाय और कोर्ट के चक्कर में हो गई सजा। 

कैसे चुकाऊ कर्जा, भागीदारी में किया दुसरे से साझा।।


जैसे कर्म वैसे मिलेगा फल ।

 भूगतोगे आज नहीं तो कल।।


कर्म की गतीने ये एहसास दिलाया। 

लुटने वाला खुद के घर से हुआ पराया।।


वह तो चला गया अपने करम से।

और दूसरा चला गया भरम से।

ना कोई चिट्ठी ना कोई संदेश। 

कहां चला गया कौन से परदेस।।


ना कोई फोन ना कोई आता पता। 

कैसे ढूंढ निकाले ऐसे लापता।।


दोनों की भागम भाग में। 

लोग रह गए घर की ताक में।।


पहले वाले को देहांतवास और दूसरे का अज्ञातवास।

इन दोनों के बीच में हमको हुआ वनवास।।

 

गहने गिरवी और बैंक की किश्तें।

आज भी जा रहें घर के हफ्ते।।


पाई-पाई जोड़कर घर का ख्वाब सजाया था। 

 सत्तर साल की माता ने पेंशन से  पैसा चुकाया था।।


खून पसीने की कमाई बेनाम हो गई। 

बिल्डरों की आपसी जंग में उम्मीद गुमनाम हो गई।।

 

एक कहता मेरी जमीन, दूसरा हक जताता।

दोनों की लड़ाई में घर वाला बहक जाता।।


इमारत खड़ी बेजान सी, सर पर छाया नहीं। 

कोर्ट के चक्कर काटने वालों को हमारी जरा भी दया नहीं ।।


कर्ज चुकाते चुकाते, सुद ब्याज ने सताया।

सुकून छिन के रंजिश ने, हंसते घर को रुलाया।।


हक जताने के चक्कर में मासूम भटक गया। 

कोर्ट कचहरी के टक्कर में बिल्डर लटक गया।।


12 साल से देख रहे सपना। 

कभी तो होगा नक्षत्र अपार्टमेंट में घर अपना।।


एक तपश्चार्य पूरी हो गई। 

अपने छत की तमन्ना अधूरी रह गई।।

 

मिटा दो झगड़े आपस के, सच्ची पुकार सुन लो। 

हम बेघर परिवारों के टूटे सपने बुन लो।।

लेखक....... 🙏

कवी.....दीपिका रामचंद्र निकाळजे......

कोन गाव, भिवंडी.....

9821837556

🙏👇👇👇👇👇👇👇👇👇 🙏 




       मेरा देश मेरा वतन समाचार 




                    🙏 पत्र के🙏




        संपादक श्री दयाशंकर गुुुप्ता जी




नोट........ 👉🙏




 दोस्तों उम्मीद करता हूं कि आप सभी, यह आर्टिकल को अंत तक पढ़े होंगे एवं यह आर्टिकल आपको बेहद पसंद आया होगा, हैं।और अगर लिखने में कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करें इस के लिए हम आप क्षमा मांगते हैं और हमारे इस आर्टिकल को लाइक करें शेयर करें ? 🙏 जनहित लोकहित के लिए धन्यवाद 🙏


जय संविधान जय भीम जय संविधान का चौथा स्तंभ ने अपने दिल की कुछ प्रमुखताएं या बातें या भावनाएं रखा है अप सभी के बिच में सभी नागरिकों के समक्ष प्रस्तुत किया है और लिखने में कोई त्रुटि हुई है तो क्षमा करें लिखने गलती हुई हैं तो क्षमा करना श्री दयाशंकर गुप्ता जी की तरफ से बहुत-बहुत धन्यवाद🙏


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