शिधावाटप नियंत्रक व संचालक, नागरी पुरवठा (मुंबई आणि ठाणे) राशनिंग नियंत्रक तथा निदेशक नागरी आपूर्ति (मुंबई एवं ठाणे) को अंग्रेजी में "Controller of Rationing and Director Civil Supplies, Mumbai" कहा जाता है और उनका कार्यालय मुंबई एवं ठाणे क्षेत्र में स्थित है। नियंत्रक राशन वितरण एवं संचालक नागरी आपूर्ति, मुंबई व ठाणे का कार्यालय
शिधावाटप नियंत्रक व संचालक, नागरी पुरवठा (मुंबई आणि ठाणे)
राशनिंग नियंत्रक तथा निदेशक नागरी आपूर्ति (मुंबई एवं ठाणे) को अंग्रेजी में "Controller of Rationing and Director Civil Supplies, Mumbai" कहा जाता है और उनका कार्यालय मुंबई एवं ठाणे क्षेत्र में स्थित है।
नियंत्रक राशन वितरण एवं संचालक नागरी आपूर्ति, मुंबई व ठाणे का कार्यालय
वित्त विभाग के संदर्भ क्र. १ के उपरोक्त दिनांक २७.१२.२०११ के शासन निर्णय के पैरा (३) में पद रिक्त होने से एक वर्ष तक की अवधि के लिए अतिरिक्त कार्यभार देने के अधिकार विभाग प्रमुख को प्राप्त हैं। इसी प्रकार सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा संदर्भित दि. ०५.०९.२०१८ के परिपत्रक के माध्यम से अतिरिक्त कार्यभार देने के संबंध में स्पष्ट मार्गदर्शक सूचनाएं जारी की गई हैं।
नियंत्रक राशन वितरण एवं संचालक नागरी आपूर्ति, मुंबई का कार्यालय,
रॉयल इंश्योरेंस बिल्डिंग, १४ जे. टाटा मार्ग, चर्चगेट, मुंबई ४०० ०२०
दूरध्वनी क्र.: ०२२ २२८२१४१९, २२८५२८१४
ई-मेल: dycor.ho-mum@gov.in
क्र. निशि/आस्था/४-अ/अति.कार्यभार/का.वि.७६४/२०२५/जा. ९८०
दिनांक: २४/१२/२०२५
संदर्भ:
१) वित्त विभाग, शासन निर्णय क्र. वेतन १३११/प्र.क्र.१७/सेवा-३, दि. २७.१२.२०११
२) सा.प्र.वि. शा.प.क्र. एसआरव्ही २०१८/प्र.क्र.२०८/कार्या. १२, दिनांक ०५.०९.२०१८
कार्यालयीन आदेश :-
वित्त विभाग के संदर्भ क्र. १ के उपरोक्त दिनांक २७.१२.२०११ के शासन निर्णय के पैरा (३) में पद रिक्त होने से एक वर्ष तक की अवधि के लिए अतिरिक्त कार्यभार देने के अधिकार विभाग प्रमुख को प्राप्त हैं। इसी प्रकार सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा संदर्भित दि. ०५.०९.२०१८ के परिपत्रक के माध्यम से अतिरिक्त कार्यभार देने के संबंध में स्पष्ट मार्गदर्शक सूचनाएं जारी की गई हैं।
तथापि, यह निर्देशित किया जाता है कि, उपरोक्त संदर्भित शासन निर्णय/परिपत्रक की प्रावधानों को ध्यान में रखे बिना परिमंडल कार्यालय की ओर से अतिरिक्त कार्यभार देने संबंधी प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाते हैं तथा कभी-कभी उपनियंत्रक राशन वितरण अपने स्तर पर स्वतः अतिरिक्त कार्यभार देकर उक्त आदेश कार्योत्तर मंजूरी के लिए प्रधान कार्यालय को प्रस्तुत करते हैं।
इस मामले में प्रधान कार्यालय तथा परिमंडल कार्यालय के स्तर पर पहले दिए गए तथा १ वर्ष से अधिक अवधि हो चुके सभी अतिरिक्त कार्यभार इस आदेश द्वारा तत्काल प्रभाव से समाप्त किए जाते हैं।
सभी उपनियंत्रक राशन वितरण को राशन वितरण निरीक्षक, वर्ग क संवर्ग के अगले संवर्ग के रिक्त पदों के अतिरिक्त कार्यभार के आदेश परिमंडल कार्यालय के स्तर पर जारी न करके संदर्भित शासन निर्णय एवं परिपत्रक की प्रावधानों की पूर्ति करके उसके संबंध में प्रस्ताव प्रधान कार्यालय को प्रस्तुत करने चाहिए।
(चंद्रकांत डांगे, भा.प्र.से.)
नियंत्रक राशन वितरण एवं संचालक नागरी आपूर्ति, मुंबई
प्रति:
१) उपनियंत्रक राशन वितरण (अंमलबजावणी) प्रधान कार्यालय, चर्चगेट, मुंबई
२) उपनियंत्रक राशन वितरण (आस्थापना), प्रधान कार्यालय, चर्चगेट, मुंबई
३) सभी उपनियंत्रक राशन वितरण मुंबई/ठाणे राशन वितरण क्षेत्र
४) सभी राशन वितरण अधिकारी, मुंबई ठाणे राशन वितरण क्षेत्र 👈
लंबे समय तक किसी अधिकारी/कर्मचारी को “प्रभारी पद” पर रखना
कानूनी व संवैधानिक दृष्टि से उचित नहीं माना जाता। भारत में इसे लेकर स्पष्ट संवैधानिक और न्यायिक दिशा-निर्देश हैं।🙏
भारत के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में लंबे समय तक "प्रभारी" (in-charge/officiating/ad-hoc) व्यवस्था को सेवा नियमों तथा संवैधानिक सिद्धांतों के विरुद्ध माना है। यह मुख्य रूप से समान काम-समान वेतन, नियमित नियुक्ति की आवश्यकता, प्रशासनिक दक्षता और अनुच्छेद 14 एवं 16 (समानता का अधिकार) के उल्लंघन के आधार पर होता है।
प्रमुख न्यायिक मत:
सुप्रीम कोर्ट ने Secretary, State of Karnataka v. Umadevi (2006) मामले में स्पष्ट किया कि लंबे समय तक अस्थायी/एडहॉक/प्रभारी व्यवस्था को नियमितीकरण का आधार नहीं बनाया जा सकता, लेकिन साथ ही सरकारों को नियमित पदों पर नियमित नियुक्तियाँ करने का निर्देश दिया। लंबी अस्थायी व्यवस्था को असंवैधानिक माना गया क्योंकि यह बैकडोर एंट्री को बढ़ावा देती है और योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन करती है।
हाल के मामलों में (जैसे आउटसोर्सिंग/एडहॉक कर्मचारियों से संबंधित) सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार "मार्केट प्लेयर" नहीं है और लंबे समय तक नियमित प्रकृति के कामों पर अस्थायी/प्रभारी कर्मचारियों को रखना लोक प्रशासन में विश्वास कम करता है तथा समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
विभिन्न हाई कोर्ट्स (जैसे इलाहाबाद, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि) ने पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि विभागों में प्रभारी प्रधानाचार्य, प्रभारी एसपी, प्रभारी डीन आदि की लंबी व्यवस्था को बार-बार खारिज किया है। निर्देश दिए गए हैं कि प्रभारी व्यवस्था केवल अस्थायी और अल्प अवधि के लिए होनी चाहिए, न कि वर्षों तक।
उदाहरणस्वरूप, कई रिट याचिकाओं में कोर्ट ने कहा कि लंबी प्रभारी व्यवस्था से प्रशासनिक निर्णय लेने में हिचक, उत्तरदायित्व की कमी और सेवा नियमों का उल्लंघन होता है।
निष्कर्ष:
यह कथन काफी हद तक सही है। कोर्ट्स ने बार-बार सरकारों को चेतावनी दी है कि नियमित पदों को लंबे समय तक प्रभारी से चलाना उचित नहीं है और इससे नियमित भर्ती प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हालांकि, कुछ अपवादों में अल्पकालिक प्रभारी व्यवस्था को स्वीकार किया गया है?🙏
नियमित पदों को लंबे समय तक प्रभारी से चलाना असंवैधानिक है
सरकारों को समयबद्ध नियमित भर्ती करनी होगी
केवल सीमित और अल्प अवधि के अपवादों में प्रभारी व्यवस्था स्वीकार्य है
लंबे समय तक “प्रभारी / Officiating / Ad-hoc” व्यवस्था : न्यायिक दृष्टिकोण
1️⃣ संवैधानिक आधार
भारत के अनुच्छेद 14 व 16 समानता और समान अवसर की गारंटी देते हैं।
लंबे समय तक प्रभारी व्यवस्था से—
नियमित भर्ती प्रक्रिया बाधित होती है
योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों का हनन होता है
मनमानी व असमानता को बढ़ावा मिलता है
इसलिए अदालतों ने इसे संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत माना है।
2️⃣ सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्णय
🔹 Secretary, State of Karnataka v. Umadevi (2006) 4 SCC 1
अस्थायी/एडहॉक/प्रभारी नियुक्ति नियमितीकरण का अधिकार नहीं देती
राज्य को निर्देश:
“नियमित पदों पर नियमित नियुक्तियाँ की जाएँ”
लंबे समय तक अस्थायी व्यवस्था को बैकडोर एंट्री बताया गया
🔹 हालिया निर्णय (Outsourcing/Contractual cases)
सरकार “Market Player” नहीं है
नियमित प्रकृति का कार्य वर्षों तक अस्थायी कर्मियों से कराना
➜ समान काम–समान वेतन
➜ लोक प्रशासन में विश्वास की हानि
3️⃣ हाई कोर्ट्स की स्पष्ट टिप्पणियाँ
इलाहाबाद, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब-हरियाणा आदि हाई कोर्ट्स ने—
👮 पुलिस विभाग (प्रभारी SP / SHO)
🎓 शिक्षा विभाग (प्रभारी प्राचार्य)
🏥 स्वास्थ्य विभाग (प्रभारी डीन / CMHO)
जैसे मामलों में कहा:
“प्रभारी व्यवस्था केवल अल्पकालिक, अंतरिम और अपवादस्वरूप हो सकती है, वर्षों तक नहीं।”
कारण बताए गए—
निर्णय लेने में हिचक
उत्तरदायित्व तय न हो पाना
सेवा नियमों का उल्लंघन
प्रशासनिक अक्षमता
4️⃣ न्यायालयों की सामान्य दिशा (Judicial Trend)
✔ प्रभारी व्यवस्था — Temporary Stop-gap
❌ स्थायी विकल्प नहीं
✔ नियमित भर्ती — Rule
❌ वर्षों तक प्रभारी — Arbitrary & Unconstitutional
🔚 निष्कर्ष
अदालतों का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि—
🔹 संवैधानिक आधार
अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
अनुच्छेद 16 – समान अवसर का अधिकार
लंबे समय तक प्रभारी रखना इन दोनों का उल्लंघन माना जा सकता है, क्योंकि व्यक्ति से नियमित पद का कार्य लिया जाता है लेकिन अधिकार, वेतन और पदोन्नति नहीं दी जाती।
🔹 न्यायिक दृष्टिकोण (Court View)
सुप्रीम कोर्ट व विभिन्न हाई कोर्टों ने कई मामलों में कहा है कि:
प्रभारी/अधोहक/ऑफिशिएटिंग व्यवस्था अस्थायी होती है
इसे वर्षों तक जारी रखना मनमाना (Arbitrary) है
प्रशासन को नियमित नियुक्ति करनी चाहिए
📌 प्रमुख निर्णयों में अदालतों ने निर्देश दिए हैं कि:
लंबे समय तक प्रभारी रहने पर नियमित पदस्थापना पर विचार हो
या फिर प्रभारी व्यवस्था तुरंत समाप्त की जाए
🔹 व्यावहारिक समस्याएं
समान काम, समान वेतन का उल्लंघन
प्रशासनिक निर्णय लेने में बाधा
कर्मचारी का शोषण
जवाबदेही और अधिकार अस्पष्ट
🔹 क्या कार्रवाई संभव है?
यदि प्रभारी व्यवस्था बहुत लंबे समय से चल रही है, तो:
प्रतिनिधित्व (Representation) विभाग को दिया जा सकता है
हाई कोर्ट में रिट याचिका (अनुच्छेद 226) दायर की जा सकती है?
महाराष्ट्र शासन के अन्न, नागरी पुरवठा आणि ग्राहक संरक्षण विभाग (Food, Civil Supplies and Consumer Protection Department) द्वारा जारी एक कार्यालयीन आदेश या परिपत्रक है। इसमें राशन वितरण विभाग में अतिरिक्त कार्यभार (Additional Charge) देने की प्रक्रिया पर सख्त निर्देश दिए गए हैं।
मुख्य बिंदु:
संदर्भित नियम:
वित्त विभाग का शासन निर्णय (दिनांक २७.१२.२०११): इसके पैराग्राफ (३) के अनुसार, पद खाली होने से एक वर्ष तक अतिरिक्त कार्यभार देने का अधिकार विभाग प्रमुख को है।
सामान्य प्रशासन विभाग का परिपत्रक (दिनांक ०५.०९.२०१८): अतिरिक्त कार्यभार देने के संबंध में स्पष्ट मार्गदर्शक सूचना।
समस्या:
परिमंडल कार्यालय (Divisional Offices) नियमों का पालन किए बिना अतिरिक्त कार्यभार के प्रस्ताव भेजते हैं।
कभी-कभी उपनियंत्रक राशन वितरण (Deputy Controller, Rationing) खुद अपने स्तर पर अतिरिक्त कार्यभार देते हैं और बाद में मुख्य कार्यालय से कार्योत्तर मंजूरी (Ex-post facto approval) मांगते हैं।
नए निर्देश:
मुख्य कार्यालय और परिमंडल कार्यालय स्तर पर पहले दिए गए एक वर्ष से अधिक अवधि के सभी अतिरिक्त कार्यभार इस आदेश से तत्काल प्रभाव से रद्द (Cancelled with immediate effect) कर दिए गए हैं।
अब, राशन वितरण निरीक्षक (Rationing Inspector, Class C) के ऊपर के रिक्त पदों का अतिरिक्त कार्यभार देने के लिए:
परिमंडल कार्यालय स्तर पर सीधे आदेश जारी न करें।
संदर्भित शासन निर्णय और परिपत्रक की शर्तें पूरी करके प्रस्ताव मुख्य कार्यालय (Head Office) को भेजें।
स्पष्टीकरण और उद्देश्य:
यह आदेश नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने और अनधिकृत या लंबे समय से चल रहे अतिरिक्त कार्यभार को रोकने के लिए जारी किया गया है। इससे प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखा जाएगा और भविष्य में सभी प्रस्ताव सही प्रक्रिया से आएंगे। इससे विभाग में पारदर्शिता और नियमितता बढ़ेगी, तथा अनावश्यक या गलत तरीके से दिए गए अतिरिक्त कार्यभार समाप्त हो जाएंगे।
यदि आपको इस आदेश की लागू करने की जानकारी, संदर्भित GR की कॉपी या इससे संबंधित अधिक विवरण चाहिए, तो बताएं! (उदाहरण: यह आदेश किस तारीख का है या पूरा दस्तावेज?)
इस आदेश पर उचित कार्रवाई की जाती है, क्योंकि यह मौजूदा नियमों (संदर्भित शासन निर्णय और परिपत्रक) के अनुरूप है।
आदेश में स्पष्ट निर्देश हैं: पुराने अतिरिक्त कार्यभार (जो 1 वर्ष से अधिक हो चुके हैं) को तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जा रहा है।
नए अतिरिक्त कार्यभार के लिए, उपनियंत्रक स्तर पर स्वतंत्र रूप से आदेश जारी नहीं करने का निर्देश है।
यह प्रक्रिया विभागीय दक्षता और नियम-अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए है। अगर कोई उल्लंघन होता है (जैसे बिना मंजूरी के अतिरिक्त चार्ज देना), तो आगे की जांच या सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं,
यदि कोई अधिकारी (जैसे उपनियंत्रक) ने बिना प्रधान कार्यालय की मंजूरी के स्वयं अतिरिक्त कार्यभार दिया या एक वर्ष से अधिक रखा, तो यह नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है।
महाराष्ट्र नागरी सेवा (शिस्त व अपील) नियमों के तहत विभागीय जांच या अनुशासनात्मक कार्रवाई (चेतावनी, वेतन कटौती आदि) हो सकती है? 🙏
Office Order from the Controller of Rationing and Director of Civil Supplies, Mumbai and Thane
The office of the Controller of Rationing and Director of Civil Supplies (Mumbai and Thane) is officially known in English as the "Controller of Rationing and Director Civil Supplies, Mumbai". The office is located in the Mumbai and Thane region.
Office of the Controller of Rationing and Director of Civil Supplies, Mumbai and Thane
Royal Insurance Building, 14 J. Tata Road, Churchgate, Mumbai 400 020
Telephone Nos.: 022-22821419, 022-22852814
Email: dycor.ho-mum@gov.in
Ref. No.: Nishi/Aastha/4-A/Addl. Charge/Office No. 764/2025/Ref. 980
Date: 24/12/2025
References:
Finance Department, Government Resolution No. Salary-1311/Case No.17/Service-3, dated 27.12.2011
General Administration Department Circular No. SRVI-2018/Case No.208/Office-12, dated 05.09.2018
Office Order:
As per paragraph (3) of the Government Resolution dated 27.12.2011 referenced above from the Finance Department, the Department Head has the authority to assign additional charge for a period of up to one year when a post becomes vacant. Similarly, clear guidelines on assigning additional charge have been issued through the circular dated 05.09.2018 referenced from the General Administration Department.
However, it is directed that divisional offices submit proposals for additional charge without considering the provisions of the referenced Government Resolution/Circular, and sometimes Deputy Controllers of Rationing independently assign additional charge at their level and later submit such orders to the Head Office for ex-post facto approval.
In this regard, all additional charges previously assigned at the Head Office and divisional office levels that have exceeded one year are hereby terminated with immediate effect by this order.
All Deputy Controllers of Rationing are instructed not to issue orders for additional charge at the divisional office level for vacant posts in the next cadre above Rationing Inspector (Class C cadre). Instead, they must fulfil the provisions of the referenced Government Resolution and Circular and submit proposals to the Head Office in this regard.
(Chandrakant Dange, I.A.S.)
Controller of Rationing and Director of Civil Supplies, Mumbai
Copies to:
Deputy Controller of Rationing (Implementation), Head Office, Churchgate, Mumbai
Deputy Controller of Rationing (Establishment), Head Office, Churchgate, Mumbai
All Deputy Controllers of Rationing, Mumbai/Thane Rationing Area
All Rationing Officers, Mumbai Thane Rationing Area
Long-term "In-Charge" Arrangements in Government Service: Judicial Perspective in India
Keeping an officer/employee on an "in-charge" post for a long period is not considered legally or constitutionally appropriate. There are clear constitutional and judicial guidelines in India on this issue.
The High Courts and Supreme Court of India have, in several cases, held long-term "in-charge"/officiating/ad-hoc arrangements to be contrary to service rules and constitutional principles. This is primarily based on violations of equal pay for equal work, the need for regular appointments, administrative efficiency, and Articles 14 and 16 of the Constitution (Right to Equality).
Key Judicial Views:
Supreme Court in Secretary, State of Karnataka v. Umadevi (2006): The Court clarified that long-term temporary/ad-hoc/in-charge arrangements cannot be a basis for regularization. It directed governments to make regular appointments on permanent posts. Prolonged temporary arrangements were deemed unconstitutional as they promote backdoor entries and violate the rights of eligible candidates.
In recent cases (related to outsourcing/contractual employees), the Supreme Court has stated that the government is not a "market player" and keeping temporary/in-charge employees on regular nature of work for years violates equal pay for equal work, reduces public trust in administration, and infringes equality rights.
Various High Courts (e.g., Allahabad, Madhya Pradesh, Rajasthan, etc.) have repeatedly struck down long-term in-charge arrangements in departments like police, education, and health (e.g., in-charge SP, Principal, Dean). Courts have directed that in-charge arrangements should only be temporary, interim, and exceptional—not for years.
Reasons cited include hesitation in decision-making, lack of accountability, violation of service rules, and administrative inefficiency.
Overall Judicial Trend:
In-charge arrangement: Only as a temporary stop-gap.
Not a permanent alternative.
Regular recruitment: The rule.
Long-term in-charge: Arbitrary and unconstitutional.
Conclusion:
The courts' view is clear:
On constitutional grounds (Articles 14 – Equality; Article 16 – Equal Opportunity), long-term in-charge arrangements can violate these as regular work is taken from the person without granting rights, pay, or promotions.
Judicial view: In-charge/officiating/ad-hoc is temporary; continuing it for years is arbitrary; administration must make regular appointments.
In key judgments, courts have directed consideration for regular posting if in-charge for long or immediate termination of such arrangements.
Practical issues: Violation of equal pay for equal work, obstacles in administrative decisions, exploitation of employees, unclear accountability and authority.
Possible action: If an in-charge arrangement has been ongoing for a very long time, a representation can be made to the department, or a writ petition (under Article 226) can be filed in the High Court.
Summary of the Office Order
This is an office order issued by Maharashtra's Food, Civil Supplies and Consumer Protection Department. It provides strict instructions on the process of assigning additional charge in the Rationing Distribution Department.
Key Points:
Referenced Rules:
Finance Department GR (dated 27.12.2011): Paragraph (3) allows the Department Head to assign additional charge for up to one year on vacant posts.
General Administration Department Circular (dated 05.09.2018): Clear guidelines on additional charge.
Issues Identified:
Divisional offices submit proposals without following rules.
Sometimes Deputy Controllers assign additional charge independently and seek ex-post facto approval from the Head Office.
New Instructions:
All additional charges exceeding one year (previously assigned at Head or Divisional level) are cancelled with immediate effect.
For vacant posts above Rationing Inspector (Class C): No direct orders at divisional level; comply with GR/Circular provisions and send proposals to Head Office.
Purpose: To ensure strict compliance with rules, prevent unauthorized or prolonged additional charges, maintain administrative discipline, promote transparency and regularity, and terminate improperly assigned charges.
If you need details on implementation of this order, copies of referenced GRs, or more information (e.g., date of the order or full document), let me know!
This order is appropriate as it aligns with existing rules (referenced GR and Circular). It clearly terminates old additional charges exceeding 1 year and restricts independent assignments at Deputy Controller level. This ensures departmental efficiency and rule compliance. If any violation occurs (e.g., assigning charge without Head Office approval or keeping beyond one year), it may lead to investigation or disciplinary action under Maharashtra Civil Services (Discipline and Appeal) Rules (e.g., warning, pay deduction, etc.).🙏
नियंत्रक शिधावाटप आणि नागरी पुरवठा संचालक, मुंबई आणि ठाणे यांचा कार्यालयीन आदेश
नियंत्रक शिधावाटप आणि नागरी पुरवठा संचालक (मुंबई आणि ठाणे) यांचे कार्यालय इंग्रजीमध्ये अधिकृतपणे "Controller of Rationing and Director Civil Supplies, Mumbai" म्हणून ओळखले जाते. हे कार्यालय मुंबई आणि ठाणे क्षेत्रात स्थित आहे.
कार्यालयाचा पत्ता:
रॉयल इन्शुरन्स बिल्डिंग, १४ जे. टाटा रोड, चर्चगेट, मुंबई ४०० ०२०
दूरध्वनी क्रमांक: ०२२-२२८२१४१९, ०२२-२२८५२८१४
ईमेल: dycor.ho-mum@gov.in
संदर्भ क्रमांक: Nishi/Aastha/4-A/Addl. Charge/Office No. 764/2025/Ref. 980
दिनांक: २४/१२/२०२५
संदर्भ:
वित्त विभाग, शासन निर्णय क्र. Salary-1311/Case No.17/Service-3, दिनांक २७.१२.२०११
सामान्य प्रशासन विभाग परिपत्रक क्र. SRVI-2018/Case No.208/Office-12, दिनांक ०५.०९.२०१८
कार्यालयीन आदेश:
वित्त विभागाच्या वरील संदर्भित शासन निर्णयाच्या परिच्छेद (३) नुसार, पद रिक्त झाल्यास विभागप्रमुखाला एक वर्षापर्यंत अतिरिक्त जबाबदारी देण्याचा अधिकार आहे. तसेच, सामान्य प्रशासन विभागाच्या दिनांक ०५.०९.२०१८ च्या संदर्भित परिपत्रकाद्वारे अतिरिक्त जबाबदारी देण्याबाबत स्पष्ट मार्गदर्शक सूचना जारी करण्यात आल्या आहेत.
परंतु, विभागीय कार्यालये संदर्भित शासन निर्णय/परिपत्रकाच्या तरतुदींचा विचार न करता अतिरिक्त जबाबदारीच्या प्रस्ताव सादर करतात आणि काहीवेळा उप नियंत्रक शिधावाटप स्वतंत्रपणे विभागीय स्तरावर अतिरिक्त जबाबदारी देऊन नंतर असे आदेश मुख्य कार्यालयाकडे मागील दिनांकाने मान्यतेसाठी (ex-post facto approval) सादर करतात.
या संदर्भात, मुख्य कार्यालय आणि विभागीय कार्यालय स्तरावर यापूर्वी दिलेल्या सर्व अतिरिक्त जबाबदाऱ्या ज्या एक वर्षापेक्षा जास्त कालावधीच्या झाल्या आहेत, त्या या आदेशाने तात्काळ प्रभावाने संपुष्टात आणण्यात येत आहेत.
सर्व उप नियंत्रक शिधावाटप यांना सूचना देण्यात येतात की, शिधावाटप निरीक्षक (वर्ग क) पुढील संवर्गातील रिक्त पदांसाठी विभागीय कार्यालय स्तरावर अतिरिक्त जबाबदारीचे आदेश जारी करू नयेत. त्याऐवजी, संदर्भित शासन निर्णय आणि परिपत्रकाच्या तरतुदींची पूर्तता करून याबाबतचे प्रस्ताव मुख्य कार्यालयाकडे सादर करावेत.
(चंद्रकांत डांगे, आय.ए.एस.)
नियंत्रक शिधावाटप आणि नागरी पुरवठा संचालक, मुंबई
प्रतिलिपी:
उप नियंत्रक शिधावाटप (अंमलबजावणी), मुख्य कार्यालय, चर्चगेट, मुंबई
उप नियंत्रक शिधावाटप (आस्थापना), मुख्य कार्यालय, चर्चगेट, मुंबई
सर्व उप नियंत्रक शिधावाटप, मुंबई/ठाणे शिधावाटप क्षेत्र
सर्व शिधावाटप अधिकारी, मुंबई-ठाणे शिधावाटप क्षेत्र
भारतातील सरकारी सेवेतील दीर्घकालीन "इन-चार्ज" व्यवस्थेबाबत न्यायिक दृष्टिकोन
सरकारी सेवेत एखाद्या अधिकाऱ्या/कर्मचाऱ्याला दीर्घकाळ "इन-चार्ज" पदावर ठेवणे कायदेशीर किंवा संवैधानिकदृष्ट्या योग्य मानले जात नाही. भारतात याबाबत स्पष्ट संवैधानिक आणि न्यायिक मार्गदर्शक तत्त्वे आहेत.
उच्च न्यायालये आणि सर्वोच्च न्यायालयाने अनेक खटल्यांमध्ये दीर्घकालीन "इन-चार्ज"/ऑफिशिएटिंग/अॅड-हॉक व्यवस्था सेवा नियमांविरोधी आणि संवैधानिक तत्त्वांविरोधी ठरवल्या आहेत. हे मुख्यत्वे समान कामासाठी समान वेतन, नियमित नियुक्त्यांची गरज, प्रशासकीय कार्यक्षमता आणि घटनेच्या कलम १४ आणि १६ (समानतेचा अधिकार) यांच्या उल्लंघनावर आधारित आहे.
मुख्य न्यायिक मत:
सर्वोच्च न्यायालयाच्या Secretary, State of Karnataka v. Umadevi (२००६) खटल्यात: दीर्घकालीन तात्पुरत्या/अॅड-हॉक/इन-चार्ज व्यवस्था नियमितीकरणाचा आधार होऊ शकत नाहीत. न्यायालयाने शासनांना कायमस्वरूपी पदांवर नियमित नियुक्त्या करण्याचे निर्देश दिले. दीर्घकालीन तात्पुरत्या व्यवस्था असंवैधानिक ठरवल्या, कारण त्या बॅकडोअर एंट्रीला प्रोत्साहन देतात आणि पात्र उमेदवारांच्या हक्कांचे उल्लंघन करतात.
अलीकडील खटल्यांमध्ये (आउटसोर्सिंग/कंत्राटी कर्मचारी संबंधित): सर्वोच्च न्यायालयाने म्हटले आहे की, शासन "मार्केट प्लेयर" नाही आणि नियमित स्वरूपाच्या कामासाठी वर्षानुवर्षे तात्पुरते/इन-चार्ज कर्मचारी ठेवणे समान कामासाठी समान वेतनाचे उल्लंघन करते, प्रशासनावरील जनतेचा विश्वास कमी करते आणि समानता हक्कांचे उल्लंघन करते.
विविध उच्च न्यायालये (उदा. इलाहाबाद, मध्य प्रदेश, राजस्थान इ.) ने पोलीस, शिक्षण, आरोग्य विभागांमध्ये दीर्घकालीन इन-चार्ज व्यवस्था (उदा. इन-चार्ज एसपी, प्राचार्य, डीन) रद्द केल्या आहेत. न्यायालयांनी निर्देश दिले की, इन-चार्ज व्यवस्था फक्त तात्पुरती, अंतरिम आणि अपवादात्मक असावी—वर्षानुवर्षे नाही.
कारणे: निर्णय घेण्यात संकोच, जबाबदारीची कमतरता, सेवा नियमांचे उल्लंघन आणि प्रशासकीय अकार्यक्षमता.
एकूण न्यायिक ट्रेंड:
इन-चार्ज व्यवस्था: फक्त तात्पुरती स्टॉप-गॅप.
कायमस्वरूपी पर्याय नाही.
नियमित भरती: नियम.
दीर्घकालीन इन-चार्ज: मनमानी आणि असंवैधानिक.
निष्कर्ष:
न्यायालयांचे मत स्पष्ट आहे:
संवैधानिक आधारावर (कलम १४ – समानता; कलम १६ – समान संधी), दीर्घकालीन इन-चार्ज व्यवस्था नियमित काम घेऊनही हक्क, वेतन किंवा पदोन्नती न देणे हे उल्लंघन करते.
न्यायिक मत: इन-चार्ज/ऑफिशिएटिंग/अॅड-हॉक तात्पुरते; वर्षानुवर्षे चालवणे मनमानी; प्रशासनाने नियमित नियुक्त्या कराव्यात.
मुख्य निकालांमध्ये: दीर्घकाळ इन-चार्ज असल्यास नियमित पदासाठी विचार किंवा अशा व्यवस्थांची तात्काळ समाप्तीचे निर्देश.
व्यावहारिक समस्या: समान कामासाठी समान वेतनाचे उल्लंघन, प्रशासकीय निर्णयांमध्ये अडथळे, कर्मचाऱ्यांचे शोषण, जबाबदारी आणि अधिकाराची अस्पष्टता.
शक्य कारवाई: दीर्घकाळ चालू असलेल्या इन-चार्ज व्यवस्थेबाबत विभागाकडे तक्रार किंवा उच्च न्यायालयात कलम २२६ अंतर्गत रिट याचिका दाखल करता येते.
कार्यालयीन आदेशाचा सारांश
हा आदेश महाराष्ट्राच्या अन्न, नागरी पुरवठा आणि ग्राहक संरक्षण विभागाचा आहे. शिधावाटप वितरण विभागात अतिरिक्त जबाबदारी देण्याच्या प्रक्रियेबाबत कठोर सूचना देतो.
मुख्य मुद्दे:
संदर्भित नियम:
वित्त विभाग शासन निर्णय (दिनांक २७.१२.२०११): परिच्छेद (३) नुसार रिक्त पदांवर विभागप्रमुख एक वर्षापर्यंत अतिरिक्त जबाबदारी देऊ शकतो.
सामान्य प्रशासन विभाग परिपत्रक (दिनांक ०५.०९.२०१८): अतिरिक्त जबाबदारीबाबत स्पष्ट मार्गदर्शक सूचना.
ओळखलेले समस्या:
विभागीय कार्यालये नियमांचा विचार न करता प्रस्ताव सादर करतात.
काहीवेळा उप नियंत्रक स्वतंत्रपणे अतिरिक्त जबाबदारी देतात आणि नंतर मुख्य कार्यालयाकडे मागील मान्यतेसाठी सादर करतात.
नवीन सूचना:
मुख्य किंवा विभागीय स्तरावर यापूर्वी दिलेल्या एक वर्षापेक्षा जास्त अतिरिक्त जबाबदाऱ्या तात्काळ रद्द.
शिधावाटप निरीक्षक (वर्ग क) पुढील रिक्त पदांसाठी: विभागीय स्तरावर थेट आदेश नाही; शासन निर्णय/परिपत्रकाची पूर्तता करून मुख्य कार्यालयाकडे प्रस्ताव सादर करा.
उद्देश: नियमांची कठोर पालनता, अनधिकृत किंवा दीर्घकालीन अतिरिक्त जबाबदाऱ्या रोखणे, प्रशासकीय शिस्त राखणे, पारदर्शकता आणि नियमितता वाढवणे, अयोग्य जबाबदाऱ्या संपुष्टात आणणे.
हा आदेश योग्य आहे कारण तो विद्यमान नियमांशी (संदर्भित शासन निर्णय आणि परिपत्रक) सुसंगत आहे. तो जुन्या एक वर्षापेक्षा जास्त अतिरिक्त जबाबदाऱ्या स्पष्टपणे रद्द करतो आणि उप नियंत्रक स्तरावर स्वतंत्र जबाबदारी देण्यावर निर्बंध घालतो. यामुळे विभागीय कार्यक्षमता आणि नियम पालन सुनिश्चित होते. जर उल्लंघन झाले (उदा. मुख्य कार्यालयाची मान्यता न घेता जबाबदारी देणे किंवा एक वर्षापेक्षा जास्त ठेवणे), तर महाराष्ट्र नागरी सेवा (शिस्त आणि अपील) नियमांतर्गत तपास किंवा शिस्तभंग कारवाई (उदा. इशारा, वेतन कपात इ.) होऊ शकते? 🙏
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