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बाळशास्त्री जांभेकर (पूर्ण नाव: बाळ गंगाधरशास्त्री जांभेकर) को मराठी पत्रकारिता के जनक के रूप में जाना जाता है। उन्हें "मराठी पत्रकारिता के पितामह" या "दर्पणकार" भी कहा जाता है। उन्होंने मराठी भाषा का पहला समाचार पत्र 'दर्पण' 6 जनवरी 1832 को शुरू किया, जिसके कारण यह दिन महाराष्ट्र में मराठी पत्रकार दिवस के रूप में मनाया जाता है।

 बाळशास्त्री जांभेकर (पूर्ण नाव: बाळ गंगाधरशास्त्री जांभेकर) को मराठी पत्रकारिता के जनक के रूप में जाना जाता है। उन्हें "मराठी पत्रकारिता के पितामह" या "दर्पणकार" भी कहा जाता है। उन्होंने मराठी भाषा का पहला समाचार पत्र 'दर्पण' 6 जनवरी 1832 को शुरू किया, जिसके कारण यह दिन महाराष्ट्र में मराठी पत्रकार दिवस के रूप में मनाया जाता है।


जन्म और मृत्यु

जन्म: सटीक तारीख स्पष्ट नहीं है, लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार लगभग 20 फरवरी 1812 (कुछ स्रोतों में 16 फरवरी का उल्लेख)। महाराष्ट्र सरकार ने 2021 से 20 फरवरी को उनकी जयंती के रूप में आधिकारिक रूप से मनाने का निर्णय लिया है। (नोट: पहले कई स्रोतों में 6 जनवरी का उल्लेख था, लेकिन वह 'दर्पण' के प्रकाशन की तारीख है, जन्म की नहीं।)

जन्मस्थान: पोंभुर्ले (या पोंबर्ले), देवगड तालुका, सिंधुदुर्ग जिला (पूर्व में रत्नागिरी जिला), कोकण, महाराष्ट्र।

मृत्यु: 17 मई 1846 (उम्र मात्र 34 वर्ष), मुंबई के निकट (कुछ स्रोतों में बनेश्वर)।

शिक्षा और विशेषताएं

बचपन में पिता गंगाधरशास्त्री से मराठी और संस्कृत सीखी। 1825 में मुंबई आकर बापू छत्रे और बापूशास्त्री शुक्ल से अंग्रेजी व संस्कृत का अध्ययन किया। वे अत्यंत बुद्धिमान थे और मराठी, संस्कृत, अंग्रेजी, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, तेलुगु, फारसी, फ्रेंच, लैटिन, ग्रीक जैसी 10 भाषाओं पर महारत हासिल की। गणित, ज्योतिष, इतिहास और पुरातत्व में भी निपुण थे।

प्रमुख योगदान

पत्रकारिता:

6 जनवरी 1832 को 'दर्पण' शुरू किया – मराठी का पहला समाचार पत्र (शुरुआत में अंग्रेजी-मराठी द्विभाषी, बाद में केवल मराठी)। इससे मराठी पत्रकारिता की शुरुआत हुई।

1840 में 'दिग्दर्शन' – मराठी का पहला मासिक पत्र शुरू किया।

शिक्षण:

एल्फिन्स्टन कॉलेज में पहला भारतीय प्रोफेसर (1834)।

बॉम्बे नेटिव एज्युकेशन सोसाइटी के डेप्युटी सेक्रेटरी, स्कूल इंस्पेक्टर आदि पदों पर कार्य।

कुलाबा वेधशाला के निदेशक।

समाज सुधार:

विधवा पुनर्विवाह, स्त्री शिक्षा, जाति उन्मूलन जैसे मुद्दों पर लेखन।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रबोधन का प्रसार।

सार्वजनिक पुस्तकालयों की आवश्यकता समझकर बॉम्बे नेटिव जनरल लायब्रेरी की स्थापना की।

अन्य योगदान:

ज्ञानेश्वरी की पहली मुद्रित संस्करण (1845)।

इतिहास और पुरातत्व अनुसंधान।

अल्पायु में ही उन्होंने शिक्षा, पत्रकारिता और समाज सुधार में क्रांतिकारी बदलाव लाए। उनके शिष्य दादाभाई नौरोजी, भाऊ दाजी लाड जैसे महान व्यक्तित्व बने।

आज भी महाराष्ट्र में उनके कार्य को आदर के साथ याद किया जाता है! 🙏

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        संपादक श्री दयाशंकर गुुुप्ता जी




नोट........ 👉🙏




 दोस्तों उम्मीद करता हूं कि आप सभी, यह आर्टिकल को अंत तक पढ़े होंगे एवं यह आर्टिकल आपको बेहद पसंद आया होगा, हैं।और अगर लिखने में कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करें इस के लिए हम आप क्षमा मांगते हैं और हमारे इस आर्टिकल को लाइक करें शेयर करें ? 🙏 जनहित लोकहित के लिए धन्यवाद 🙏



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